कविता “और भी दूँ” JKBOSE के कक्षा 7 (Class 7th of JKBOSE) के छात्रों की पाठ्य-पुस्तक पुष्प भाग 2 हिंदी का आठवाँ अध्याय है। यह कविता रामावतार त्यागी द्वारा लिखित है। यह पोस्ट Aur Bhi Dun Class 7 Hindi Poem 10 Question Answers के बारे में है। इस पोस्ट में आप कविता “और भी दूँ” के शब्दार्थ, सरलार्थ और उससे जुड़े कुछ प्रश्न उत्तर पढ़ेंगे। पढ़ेंगे। पिछली पोस्ट में, आपने Bhor Aur Barkha Class 7 Hindi Chapter 9 Question Answers के बारे में पढ़ा। आइए शुरू करें:

Aur Bhi Dun Class 7 Hindi Poem 10 Question Answers
Aur Bhi Dun Class 7 Hindi Poem 10 Summary (सार)
कविता का सार
श्री रामावतार त्यागी द्वारा रचित कविता ‘और भी दूँ’ एक देशभक्ति-पूर्ण रचना है। इस कविता में कवि मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पण करने की प्रेरणा देता है। कवि अपना तन, मन और जीवन देश पर न्योछावर करने को तत्पर है, फिर भी उसे लगता है कि इतना देना पर्याप्त नहीं है—वह देश के लिए और भी कुछ देना चाहता है।
कवि मानता है कि उस पर मातृभूमि का गहरा ऋण है, इसलिए वह अपना मान-सम्मान और शान भी देश पर अर्पित करने को तैयार है। वह माँ के चरणों की धूल मस्तक पर लगाकर युद्धभूमि में शत्रुओं को ललकारता है। उसकी आयु का प्रत्येक क्षण मातृभूमि को समर्पित है और वह देश की धरती पर अपना सब कुछ न्योछावर कर देने का संकल्प व्यक्त करता है।
Aur Bhi Dun Class 7 Hindi Poem 10 Explanation (सप्रसंग सरलार्थ)
सप्रसंग सरलार्थ
1. मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित,
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे और भी दूँ।
शब्दार्थ– समर्पित = अर्पित किया हुआ, दिया हुआ, सौंपा हुआ। तन = शरीर। जीवन = ज़िंदगी।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग–2’ में संकलित श्री रामावतार त्यागी की “ और भी दूँ” कविता में से लिया गया है। जिसमें मातृ-भूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने का विचार व्यक्त किया गया है।
सरलार्थ – कवि मातृभूमि से कहता है कि मेरा मन, मेरा शरीर और मेरा पूरा जीवन पहले से ही तुम्हें समर्पित है। हे मेरे देश की धरती! इतना देने के बाद भी मेरा मन नहीं भरता, मैं तुम्हारे लिए और भी अधिक त्याग करना चाहता हूँ।
2. तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कह रहा, फिर भी निवेदन –
थाल में लाऊँ सजा कर भाल जब भी,
कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण,
गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्त का कण-कण समर्पित,
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे और भी दूँ।
शब्दार्थ – ॠण = कर्ज़ । अकिंचन = दीन, जिसके पास कुछ न हो। निवेदन = प्रार्थना | भाल = मस्तक । स्वीकार = मंजूर, | अर्पित = भेंट। रक्त = खून।
प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक पुष्प भाग 2 में संकलित श्री रामावतार त्यागी द्वारा रचित कविता ‘और भी दूँ’ से लिया गया है। इस पद्यांश में कवि अपनी मातृ-भूमि के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता है और स्वयं को तुच्छ मानते हुए भी देश के लिए सर्वस्व अर्पण करने की भावना प्रकट करता है।
सरलार्थ – कवि कहता है कि हे मातृ-भूमि! तुम्हारा मुझ पर बहुत बड़ा ऋण है, जबकि मैं एक तुच्छ और निर्धन व्यक्ति हूँ। फिर भी मैं तुमसे विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि जब मैं अपना मस्तक थाल में सजा कर तुम्हें भेंट करने आऊँ, तो दया करके उस समर्पण को स्वीकार कर लेना। मेरे गीत, मेरे प्राण और मेरे रक्त की एक-एक बूँद तुम्हारे लिए समर्पित है। हे देश की धरती! मैं तुम्हें अपना सब कुछ देने के बाद भी और अधिक देना चाहता हूँ।
3. माँ दो तलवार को लाओ न देरी,
बाँध दो कस कर कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूली थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया घनेरी,
स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित,
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे और भी दूँ।
शब्दार्थ – माँज दो = चमका दो । भाल = मस्तक, माथा। चरण = पैर । शीश = सिर । आशीष = आशीर्वाद । घनेरी = घनी, गहरी । स्वप्न = सपना। आयु = उम्र।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक पुष्प भाग 2 में संकलित श्री रामावतार त्यागी द्वारा रचित कविता ‘और भी दूँ’ से लिया गया है। इस पद्यांश में कवि मातृ-भूमि की रक्षा के लिए युद्ध-भूमि में जाने को पूर्ण रूप से तैयार दिखाई देता है और देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की भावना व्यक्त करता है।
सरलार्थ – कवि मातृ-भूमि से कहता है कि मेरी तलवार को चमका दो और इसमें कोई देर न करो। मेरी ढाल को कमर पर कसकर बाँध दो। अपने पवित्र चरणों की थोड़ी-सी धूल मेरे मस्तक पर लगा दो और मेरे सिर पर अपना आशीर्वाद बनाए रखना। मातृ-भूमि के आशीर्वाद से शत्रु मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। मेरे सपने, मेरे विचार और मेरी पूरी आयु का एक-एक क्षण देश को समर्पित है। हे देश की धरती! मैं तुम्हारे लिए और भी अधिक बलिदान देना चाहता हूँ।
4. तोड़ता हूँ, मोह का बंधन क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार – घर, आँगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो,
और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो,
ये सुमन लो, यह चमन लो,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित,
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे और भी दूँ।
शब्दार्थ — मोह = ममता, लगाव । क्षमा = माफी । ध्वज = झंडा । द्वार = दरवाज़ा । सुमन = फूल। चमन = बाग। नीड़ = घोंसला । तृण = तिनका ।
प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक पुष्प भाग 2 में संकलित श्री रामावतार त्यागी द्वारा रचित कविता ‘और भी दूँ’ से लिया गया है। इस पद्यांश में कवि पारिवारिक मोह-ममता का त्याग कर मातृ-भूमि की रक्षा के लिए रण-क्षेत्र में जाने की दृढ़ इच्छा व्यक्त करता है।
सरलार्थ— कवि कहता है कि मैं अपने परिवार और घर-आँगन के प्रति लगाव का बंधन तोड़ रहा हूँ, इसके लिए मुझे क्षमा कर देना। हे मेरे गाँव, घर और आँगन! मैं सब कुछ छोड़कर देश की सेवा के लिए जा रहा हूँ, मुझे माफ़ कर देना। आज मेरे दाएँ हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में देश का झंडा थमा दो। मेरे जीवन के सुख-साधन, फूलों-सा सुंदर बाग और जीवन रूपी घोंसले का एक-एक तिनका मातृ-भूमि को समर्पित है। हे देश की धरती! मैं तुम्हारे लिए और भी अधिक बलिदान देना चाहता हूँ।
Aur Bhi Dun Class 7 Hindi Poem 10 Question Answers
अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
बोध और सराहना
प्रश्न 1. कवि ने इस कविता में क्या-क्या समर्पित करने की बात कही है?
उत्तर – कवि मातृ-भूमि पर अपना तन-मन और जीवन समर्पित करना चाहता है।
प्रश्न 2. सर्वस्व समर्पण के बाद भी कवि क्यों संतुष्ट नहीं है?
उत्तर – कवि स्वयं को तुच्छ समझता है और उस पर मातृ-भूमि का ऋण बहुत ज्यादा है। इसलिए वह सर्वस्व समर्पण के बाद भी संतुष्ट नहीं है तथा कुछ और भी समर्पित करना चाहता है।
प्रश्न 3. थाल में लाऊँ सजा कर भाल जब भी,
कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण ।
“थाल में भाल सजाने ” से कवि का क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट करें।
उत्तर – कवि मातृ-भूमि की रक्षा के लिए अपना शीश चढ़ाने के लिए तैयार है । वह आत्मबलिदान देना चाहता है।
प्रश्न 4. ‘गान अर्पित’ और ‘स्वप्न अर्पित’ से क्या आशय है?
उत्तर – गान से आशय सुखों से है और स्वप्न से आशय आशाओं और इच्छाओं से है ।
कवि अपने सुखों और इच्छाओं को मातृभूमि पर न्योछावर करने को तैयार है।
प्रश्न 5. भाव स्पष्ट करें-
(क) शीश पर आशीष की छाया घनेरी ।
(ख) नीड़ का तृण – तृण समर्पित ।
उत्तर- (क) कवि चाहता है कि मुझे अपने पूर्वजों और मातृ-भूमि का जो आशीर्वाद प्राप्त है; उसकी छाया बहुत घनी है। अतः रणभूमि में शत्रु मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
(ख) मेरा घर का तिनका तिनका (तन, मन और धन) मातृ-भूमि को समर्पित है।
प्रश्न 6. प्रस्तुत कविता का मुख्य भाव क्या है ? सही चुनाव करें-
(क) त्याग-बलिदान की चाह
(ख) धरती का मोह
(ग) देश की महानता का गुणगान
(घ) देशवासियों की प्रशंसा।
उत्तर—(क) त्याग बलिदान की चाह।
प्रश्न 7. कविता में व्यक्त कवि की भावना को एक वाक्य में लिखें।
उत्तर – कवि मातृ-भूमि पर अपना सर्वस्व अर्पण करना चाहता है।
योग्यता – विस्तार
- इस कविता को कंठस्थ करके कक्षा में सुनाएँ ।
(यह एक गीत है। गीत का प्रभावशाली सस्वर पाठ करने के लिए आवश्यक है कि ‘टेक’ का एकाधिक बार पर्याप्त आरोह-अवरोह, गति-विराम और बलाघात के साथ वाचन किया जाए ।
- देश-प्रेम की कविताओं का संकलन करें और जो कविता आपको सबसे अच्छी लगती है, उसे अपने साथियों को सुनाएँ ।
Aur Bhi Dun Class 7 Hindi Poem 10 Question Answers के बारे में बस इतना ही। आशा है कि आपको यह उपयोगी लगा होगा। आप इस पोस्ट के बारे में अपने विचार नीचे टिप्पणी अनुभाग (comment section) में साझा करें।
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