पाठ “लोकगीत” JKBOSE के कक्षा 6 (Class 6th of JKBOSE) के छात्रों की पाठ्य-पुस्तक पुष्प भाग 1 हिंदी का नौवां अध्याय है। यह पोस्ट Lokgeet Class 6th Hindi Chapter 10 Question Answers के बारे में है। यह पाठ भगवतशरण उपाध्याय द्वारा लिखित है। इस पोस्ट में आप पाठ “लोकगीत” के शब्दार्थ, सरलार्थ और उससे जुड़े कुछ प्रश्न उत्तर पढ़ेंगे। पिछली पोस्ट में, आपने Main Sabse Chhoti Hun Class 6th Poem Question Answers के बारे में पढ़ा। आइए शुरू करें:

Lokgeet Class 6th Hindi Chapter 10 Question Answers
Lokgeet Class 6th Hindi Chapter 10 Summary
पाठ का सार
लोकगीत का अर्थ है—जनता का संगीत। अपनी सहजता, ताज़गी और लोकप्रियता के कारण लोकगीत शास्त्रीय संगीत से भिन्न होते हैं। इनकी रचना प्रायः गाँवों में विभिन्न अवसरों पर गाने के लिए स्त्रियों द्वारा की जाती है। इन्हें साधारण ढोलक, झाँझ, करताल, बाँसुरी आदि वाद्ययंत्रों के साथ गाया जाता है। कुछ समय पहले तक लोकगीतों को शास्त्रीय संगीत से कम महत्त्व दिया जाता था, किंतु बदलते समय ने लोकगीतों और लोक-साहित्य को सम्मानजनक स्थान प्रदान किया है। आज अनेक लोगों ने विभिन्न बोलियों में लोकगीतों का संग्रह कर उन्हें प्रकाशित किया है।
लोकगीत अनेक प्रकार के होते हैं। आदिवासियों का संगीत अत्यंत ओजस्वी और सजीव होता है। मध्य प्रदेश, दक्कन और छोटा नागपुर क्षेत्रों में रहने वाले गोंड-खांड, ओराँव-मुंडा, भील, संथाल आदि जनजातियों के गीत और नृत्य विशेष प्रसिद्ध हैं। इनके गीत प्रायः बीस-बीस स्त्री-पुरुषों के दल में एक साथ या प्रश्न-उत्तर शैली में गाए जाते हैं, जिससे चारों दिशाएँ गूँज उठती हैं। इनका जीवन नियमों की कठोरता से मुक्त, स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होता है।
पहाड़ी क्षेत्रों के गीत भी विविध रूपों में पाए जाते हैं। गढ़वाल, किन्नौर, कांगड़ा आदि क्षेत्रों के अपने-अपने गीत और उन्हें गाने की अलग-अलग विधियाँ हैं। भिन्नता के बावजूद इन सबको सामूहिक रूप से ‘पहाड़ी गीत’ कहा जाता है।
वास्तविक लोकगीत गाँवों और देहातों में ही मिलते हैं। इनमें ग्रामीण जीवन की आत्मा बसती है। चैता, कजरी, बारहमासा, सावन आदि लोकगीत मिर्ज़ापुर, बनारस, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बिहार के क्षेत्रों में गाए जाते हैं। बंगाल में बाऊल और भटियाली, पंजाब में माहिया, हीर-रांझा तथा सोहनी-महिवाल के गीत और राजस्थान में ढोला-मारू के लोकगीत बड़े चाव से गाए जाते हैं।
लोकगीत कल्पना पर नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की रोज़मर्रा की घटनाओं पर आधारित होते हैं। इसलिए ये सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं। इनके राग प्रायः पीलू, सारंग, दुर्गा, सावन आदि होते हैं। देहात में कहरवा, बिरहा, धोबिया जैसे राग प्रचलित हैं। लोकगीतों की ग्रामीण भाषा उन्हें अत्यंत मधुर और आनंददायक बनाती है—यही उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है।
भोजपुर क्षेत्र में ‘विदेसिया’ लोकगीत समूह में गाते हुए गाँव-गाँव घूमते हैं। बिहार में ‘बिदेसिया’ अत्यंत लोकप्रिय है। इन गीतों का विषय प्रायः परदेस गए प्रेमी, विरह और करुणा पर आधारित होता है। जंगलों में रहने वाली जातियों में भी बिरहा जैसे दल-गीत गाए जाते हैं। पुरुष और स्त्रियाँ दल बनाकर एक-दूसरे के उत्तर में गीत गाते हैं, हालाँकि आज इस प्रकार का सामूहिक गायन कम होता जा रहा है।
बुंदेलखंड में ‘आल्हा’ के गीत प्रसिद्ध हैं। इनका आरंभ चंदेल राजाओं के राजकवि जगनिक द्वारा रचित आल्हा-ऊदल की वीरता के महाकाव्य से माना जाता है। बाद में अन्य ग्रामीण कवियों ने इन्हें अपनी-अपनी बोलियों में ढाला। आज भी ये गीत बड़े प्रेम से गाए जाते हैं। नट इन्हें रस्सी पर खेल करते हुए गाते हैं। ये गद्य-पद्यात्मक होते हैं और इनके अपने विशिष्ट बोल होते हैं।
हमारे देश में स्त्रियों द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों की संख्या अधिक है और उनकी रचना भी प्रायः स्त्रियाँ ही करती हैं। पुरुष भी लोकगीत गाते हैं, किंतु उनका संबंध भी अधिकांशतः स्त्रियों से जुड़ा होता है। भारतीय लोकगीत अन्य देशों से इस दृष्टि से भिन्न हैं कि यहाँ स्त्रियों के गीत पुरुषों से अलग होते हैं। भारत में जन्म, विवाह, मटकोर, ज्योनार आदि अवसरों पर अलग-अलग गीत गाए जाते हैं। इन गीतों की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। महाकवि कालिदास ने भी अपने ग्रंथों में सोहर, बानी, सेहरा आदि गीतों का उल्लेख किया है। बारहमासा गीत स्त्री-पुरुष दोनों गाते हैं।
स्त्रियों के गीत प्रायः दल बनाकर गाए जाते हैं। स्वरों में पूर्ण मेल न होने पर भी वे अत्यंत मधुर लगते हैं। होली और बरसात में गाई जाने वाली कजरी विशेष रूप से मनमोहक होती है। पूर्वी भारत में विवाह और जन्म के अवसरों पर गायिकाएँ बुलाई जाती हैं। इनमें मैथिल कोकिल विद्यापति के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ‘अपने-अपने विद्यापति’ माने जाते हैं।
स्त्रियाँ ढोलक के साथ गाते-गाते नृत्य भी करती हैं। गुजरात में ‘गरबा’ नामक लोकगायन अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें स्त्रियाँ घूम-घूमकर विशेष विधि से गाती और ताल देती हैं। आज गरबा लगभग सभी प्रांतों में लोकप्रिय हो गया है। ब्रज क्षेत्र में होली के अवसर पर ‘रसिया’ गाया जाता है। इन लोकगीतों में ग्रामीण जीवन अपनी संपूर्ण जीवंतता के साथ लहराता दिखाई देता है। असंख्य लोकगीत वहाँ के स्वतंत्र और बंधन-रहित जीवन के सजीव प्रतीक हैं।
Lokgeet Class 6th Hindi Chapter 10 Word Meaning
कठिन शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| लोच | लचीलापन, लचक । |
| झांझ | दो कांसे की तश्तरियों से बना हुआ एक प्रकार का वाद्ययंत्र । |
| करताल | एक प्रकार का वाद्ययंत्र । |
| हेय | हीन, तुच्छ । |
| ओजस्वी | ओज भरा प्रभावकारी । |
| सिरजती | बनाती, सृजन करती। |
| आह्लाद कर | हर्षकर । |
| कृत्रिम | बनावटी । |
| अबूझ | जो समझने योग्य न हो, क्लिष्ट । |
| बखान | वर्णन, बड़ाई, गुण-कथन । |
| उल्लसित | खुश । |
| उद्दाम | बंधन रहित, बहुत ज़्यादा । |
अर्थ ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न- नीचे लिखे गद्यावतरणों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
- लोकगीत सीधे जनता के संगीत हैं। घर, गाँव और नगर की जनता के गीत हैं ये।। इनके लिए साधना की ज़रूरत नहीं होती। त्योहारों और विशेष अवसरों पर ये गाए जाते हैं। सदा से ये गाए जाते रहे हैं और इनके रचने वाले भी अधिकतर गाँव के लोग ही हैं। स्त्रियों ने भी इनकी रचना में विशेष भाग लिया है। ये गीत बाजों की मदद के बिना ही या साधारण ढोलक, झाँझ, करताल, बाँसुरी आदि की मदद से गाए जाते हैं।
(क) लोकगीत किसे कहते हैं ? ये किस प्रकार गाए जाते हैं ?”
(ख) लोकगीतों की रचना किन्होंने की है ?
उत्तर- (क) लोकगीत जनता के गीत हैं जिनके लिए किसी को विशेष प्रयत्न नहीं करने पड़ते। ये त्योहारों तथा विशेष अवसरों पर गाए जाते हैं। इनके लिए विशेष प्रकार के वाद्यों की आवश्यकता नहीं होती पर ये साधारण ढोलक, झाँझ आदि की सहायता से ल में गाए जाते हैं।
(ख) लोकगीतों की रचना करने वाले प्रायः लोग अनपढ़ होते हैं।
- लोकगीतों के कई प्रकार हैं। इनका एक प्रकार तो बड़ा ही ओजस्वी और सजीव है। यह इस देश के आदिवासियों का संगीत है। मध्य प्रदेश, दकन, छोटा नागपुर में गोंड-खांड, ओराँव – मुंडा, भील- संथाल आदि फैले हुए हैं, जिनमें आज भी जीवन नियमों की जकड़ में बँध न सका और निद्वंद्व लहराता है। इनके गीत और नाच अधिकतर साथ-साथ और बड़े-बड़े दलों में गाए और नाचे जाते हैं। बीस-बीस, तीस-तीस आदमियों और औरतों के दल एक साथ या एक-दूसरे के जवाब में गाते हैं, दिशाएँ गूँज उठाती हैं ।
(क) लोकगीतों को किनका संगीत माना जाता है ?
(ख) लोकगीतों में कौन-कौन सी विशेषताएँ दिखाई देती हैं ?
उत्तर- (क) लोकगीतों को प्रायः आदिवासियों का संगीत माना जाता है जिनमें ओज और सजीव भावों की प्रमुखता 1
(ख) लोकगीत संगीतमयता से भरपूर होते हैं। इन्हें नृत्य के साथ गाया जाता है ।
- वास्तविक लोकगीत देश के गाँवों और देहातों में है। इनका संबंध देहात की जनता से है। बड़ी जान होती है इनमें । चैता, कजरी, बारहमासा, सावन आदि मिर्ज़ापुर, बनारस और उत्तर प्रदेश के अन्य पूरबी और बिहार के पश्चिमी जिलों में गाए जाते हैं। बाउल और भतियाली बंगाल के लोकगीत हैं। पंजाब में माहिया आदि इसी प्रकार के हैं।
(क) वास्तविक लोकगीतों का संबंध किनसे माना जाता है ?
(ख) हमारे देश के विभिन्न प्रदेशों में कौन-कौन से लोकगीत गाए जाते हैं ?
उत्तर- (क) वास्तविक लोकगीतों का संबंध देहातों से माना जाता है।
(ख) हमारे देश में मिर्ज़ापुर, बनारस, उत्तर प्रदेश के अन्य पूर्वी भाग और बिहार के पश्चिमी ज़िलों में चैता, कजरी, बारहमासा, सावन आदि लोकगीत लोगों के द्वारा गाए जाते हैं। बंगाल में बाउल और मतियाली गाय, पंजाब में माहिया का खूब प्रचलन है।
- अनंत संख्या अपने देश में स्त्रियों के गीतों की है । हैं तो ये गीत भी लोकगीत ही, पर अधिकतर इन्हें औरतें ही गाती हैं। इन्हें सिरजती भी अधिकतर वही हैं। वैसे मर्द रचने वालों या गाने वालों की भी कमी नहीं है पर इन गीतों का संबंध विशेषतः स्त्रियों से है । इस दृष्टि से भारत इस दिशा में सभी देशों से भिन्न है क्योंकि संसार के अन्य देशों में स्त्रियों के अपने गीत मर्दों या जनगीतों से अलग और भिन्न नहीं हैं, मिले-जुले ही हैं।
(क) हमारे देश में प्राय: किनके गीतों की संख्या अधिक है ?
(ख) किस दृष्टि से भारत संसार के अन्य देशों से भिन्न है ?
उत्तर- (क) हमारे देश में प्रायः स्त्रियों के द्वारा गाए जाने वाले गीतों की संख्या अधिक है। इन गीतों को स्त्रियाँ ही अधिक गाती हैं और उनकी रचना भी स्त्रियों ने ही की है।
(ख) भारत में स्त्रियों के गीत पुरुषों के गीतों से अलग हैं। लोकगीतों को स्त्रियाँ ही अधिकतर रचती और गाती हैं। अन्य देशों में स्त्रियों और पुरुषों के गीत अलग नहीं होते ।
- एक विशेष बात यह है कि नारियों के गाने साधारणतः अकेले नहीं गाए जाते, दल बाँधकर गाए जाते हैं । अनेक कंठ एक साथ फूटते हैं यद्यपि अधिकतर उनमें मेल नहीं होता, फिर भी त्योहारों और शुभ अवसरों पर वे बहुत ही भले लगते हैं। गाँवों और नगरों में गायिकाएँ भी होती हैं जो विवाह, जन्म आदि के अवसरों पर गाने के लिए बुला ली जाती हैं। सभी ऋतुओं में स्त्रियाँ उल्लसित होकर दल बाँधकर गाती हैं। पर होली, बरसात की कजरी आदि तो उनकी अपनी चीज़ है, जो सुनते ही बनती है। पूरब की बोलियों में अधिकतर मैथिल कोकिल विद्यापति के गीत गाए जाते हैं । पर सारे देश के – कश्मीर से कन्या कुमारी – केरल तक और काठियावाड़-गुजरात- राजस्थान से उड़ीसा – आंध्र तक अपने-अपने विद्यापति हैं ।
(क) नारियों के द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों की क्या विशेषता है ?
(ख) किन अवसरों पर अधिक लोकगीत गाए जाते हैं ?
(ग) पूरब की बोलियों में अधिक गीत किसके गाए जाते हैं ?
उत्तर—(क) नारियों के द्वारा गाए जाने वाले लोकगीत मिलकर गाए जाते हैं। इन्हें अकेला नहीं गाया जाता। इन्हें दलों में गाया जाता है। त्योहारों और शुभ अवसरों इन्हें गाया जाता है ।
(ख) विवाह, जन्म के अवसरों और होली बरसात आदि ऋतुओं के अधिक लोकगीत गाए जाते हैं।
(ग) पूरब की बोलियों में अधिक गीत विद्यापति के गाए जाते हैं ।
ध्यान देने योग्य शब्द
लोच — लचीलापन, लचक
झाँझ — काँसे की दो तश्तरियों से बना हुआ वाद्य यंत्र
करताल — एक प्रकार का वाद्य यंत्र
हेय — हीन, तुच्छ
ओजस्वी — ओज भरा, प्रभावकारी
सिरजती — बनाती, सृजन करती
आह्लादकर — हर्षकर
कृत्रिम — बनावटी
अबूझ — जो समझने योग्य न हो, क्लिष्ट
बखान — वर्णन, बड़ाई, गुण-कथन
उल्लसित — खुश
उद्दाम — बंधन सहित, बहुत ज़्यादा ।
Lokgeet Class 6th Hindi Chapter Question Answers
अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
निबंध से
प्रश्न 1. निबंध में लोकगीतों के किन पक्षों की चर्चा की गई है ? बिंदुओं के रूप में उन्हें लिखो।
उत्तर – लोकगीत का अर्थ है जनता के गीत । इनके लिए शास्त्रीय संगीत की तरह साधना की ज़रूरत नहीं होती है। लेख में लोकगीतों के निम्न पक्षों की चर्चा की गई है-
(क) लोकगीत जनता के गीत होने के कारण लोगों में ज़्यादा लोकप्रिय होते हैं। लोकगीतें में लोच तथा ताज़गी होती है।
(ख) लोकगीतों के माध्यम से हमें आदिवासी, पहाड़ी, पंजाबी, भोजपुरी जंगल की जातियों आदि के रहन-सहन, खान-पान आदि का पता चलता है।
(ग) लोकगीतों की भाषा बड़ी सरल होती है। यह आम बोल-चाल की भाषा में होते हैं, जो लोगों के मर्म को छू लेते हैं और सुनने में आनंददायक और आह्लादकर होते हैं।
(घ) लोकगीतों की रचना अधिकतर स्त्रियाँ करती हैं। इनकी रचना विभिन्न अवसरों पर की जाती है, जैसे-विवाह, जन्म, तीज-त्योहार आदि ।
(ङ) लोकगीतों को गाने के लिए विशेष वाद्ययंत्रों की आवश्यकता नहीं होती है। ये साधारण ढोलक, झांझ, करताल, बाँसुरी आदि की मदद से गाए जाते हैं।
प्रश्न 2. हमारे यहाँ स्त्रियों के खास गीत कौन-कौन से हैं?
उत्तर—हमारे यहाँ स्त्रियों के खास – गीत त्योहारों, नदियों में नहाते समय, नहाने जाते हुए, विवाह, जन्म, भटकोड़, ज्यौनार, संबंधियों के लिए प्रेमयुक्त गाली आदि के अवसरों के गीत होते हैं।
प्रश्न 3. निबंध के आधार पर और अपने अनुभव के आधार पर (यदि तुम्हें लोकगीत सुनने के कई मौके मिले हैं तो ) तुम लोकगीतों की कौन-कौन सी विशेषताएँ बता सकते हो ?
उत्तर – लोकगीतों के माध्यम से हमें पारिवारिक, सामाजिक रिश्तों की जानकारी मिलती है | देहाती जीवन के रोज़मर्रा जीवन की झलक मिलती है। लोकगीतों की भाषा इतनी सरल होती है कि सीधे मन को छू लेती है। इन्हें गाने के लिए किसी विशेष साधना की आवश्यकता नहीं होती है। लोकगीत अकेले नहीं गाए जा सकते, इन्हें समूह में ही गाया जाता है। इनको गाने से मिल-जुल कर रहने की प्रेरणा मिलती है। 1
प्रश्न 4. ” पर सारे देश के ……………अपने-अपने विद्यापति हैं ।” इस वाक्य का क्या अर्थ है ? पाठ पढ़कर मालूम करो और लिखो ।
उत्तर- ” पर सारे देश… .. अपने अपने विद्यापति है ।” इस वाक्य का अर्थ है कि लोकगीतों को रचने वाले प्रत्येक क्षेत्र में अलग-अलग होते हैं। जैसे पूर्व की बोलियों में अधिकतर मैथिल कोकिल विद्यापति के गीत गाए जाते हैं । उसी प्रकार से सारे देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और काठियावाड़, गुजरात, राजस्थान से उड़ीसा तक सभी क्षेत्रों में लोकगीत वहाँ की स्थिति पर वहाँ के रचनाकारों द्वारा लिखे जाते हैं और उनके द्वारा गाये जाते हैं। इसलिए कहा है कि प्रत्येक क्षेत्र के अपने-अपने विद्यापति होते हैं।
अनुमान और कल्पना
प्रश्न 1. क्या लोकगीत और नृत्य सिर्फ़ गाँवों या कबीलों में ही पाए जाते हैं ? शहरों के कौन-से लोकगीत हो सकते हैं? इस पर विचार करके लिखो ।
उत्तर—अधिकतर लोकगीत और नृत्य गाँवों और कबीलों में ही पाए जाते हैं क्योंकि वहाँ का जीवन नियमों में बँधा हुआ नहीं होता है। वहाँ के लोग सरल स्वभाव के होते हैं। वे अपनी खुशियाँ दल बनाकर एक-दूसरे के साथ गाते हुए बाँटते हैं। इसीलिए लोकगीतों और लोक नृत्यों में छोटे-बड़े, जात-पात का भेद समाप्त हो जाता है।
शहरों के भी लोकगीत होते हैं। शहरी जीवन भी अधिकतर गाँवों से जुड़ा होता है। शहर के लोग भी विशेष अवसरों पर जैसे – विवाह, जन्म, तीज-त्योहारों आदि पर लोक-गीतों के माध्यम से आनंद मनाते हैं। वे इन लोक-गीतों को सुनते हुए अपनी रोज़मर्रा की भाग-दौड़ वाले जीवन को भूल जाते हैं। आपस में मिल-जुल कर रहने की प्रेरणा मिलती है।
प्रश्न 2. ‘जीवन जहाँ इठला-इठला कर लहराता है, वहाँ भला आनंद के स्रोतों की कमी हो सकती है ? उद्दाम जीवन के ही वहाँ के अनंत संख्यक गाने प्रतीक हैं।‘ क्या तुम इस बात से सहमत हो ? ‘ बिदेसिया‘ नामक लोकगीत से कोई कैसे आनंद प्राप्त कर सकता है और वे कौन लोग हो सकते हैं जो इसे गाते सुनते हैं ? इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर अपने शिक्षक को सुनाओ।
उत्तर – हम इस बात से सहमत हैं कि देहातों में जीवन बंधन रहित है। देहाती लोग सरल एवं सीधे स्वभाव के होते हैं। उनमें छल-कपट नहीं होता है। वहाँ का जीवन किसानों के खेतों में, कुम्हारों की मिट्टी में नदियों-घाटों आदि पर दिखाई देता है। इसीलिए इन गीतों में देहात का सरल स्वच्छ जीवन दिखाई देता है।
‘विदेसिया’ नामक लोकगीत भोजपुरी में गाए जाते हैं। बिहार में तो ‘विदेसिया’ लोकगीत को अन्य लोकगीतों की अपेक्षा अधिक सुना जाता है। इसे गाने वाले लोग समूह में इकट्ठे होते हैं। वे गाँव-गाँव गाते घूमते हैं। अधिकतर इन गीतों को वे लोग सुनना पसंद करते हैं जिनके प्रियतम बाहर काम से गए होते हैं। इन गीतों में रसिक प्रेमियों और प्रियाओं की कथा रहती हैं। इन में परदेशी प्रेमी की भी कथा होती है। इन लोकगीतों में करुणा और विरह का रस सुनने को मिलता है। इन में बिछुड़े हुए लोगों का दर्द और मिलने की तीव्रता दिखाई देती है। इसलिए विर जनों को इन्हें सुनकर सांत्वना मिलती है और वे आनंद का अनुभव करते हैं।
कुछ करने को
प्रश्न 1. तुम अपने इलाके के कुछ लोकगीत इकट्ठा करो। गाए जाने वाले मौकों के अनुसार उनका वर्गीकरण करो ।
उत्तर- विद्यार्थी अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।
प्रश्न 2. जैसे-जैसे शहर फैल रहे हैं और गाँव सिकुड़ रहे हैं, लोकगीतों पर उनका क्या असर पड़ रहा है ? अपने आसपास के लोगों से बातचीत करके और अपने अनुभवों के आधार पर एक अनुच्छेद लिखो ।
उत्तर – लोकगीत का अर्थ है जनता का संगीत जिसमें जनजीवन की लोच और ताज़गी देखने को मिलती है। लोकगीतों का इतिहास बहुत पुराना है। जीवन के आरंभ के साथ हैं।लोकगीत भी अस्तित्व में आए हैं। लोकगीतों के माध्यम से लोग अलग-अलग त्योहारों पर अपनी प्रसन्नता दल बनाकर नाच-गाकर प्रकट करते हैं। लोकगीत देहाती जीवन की जान हैं। इन देहाती गीतों के रचयिता कोरी कल्पना को न लेकर अपने विषय रोज़मर्रा के बहते जीवन से लेने हैं। इनकी भाषा सरल होती है जो सीधे मन को छू लेती है। आजकल लोकगीत अपना स्वरूप खे रहे हैं, क्योंकि बढ़ते शहरीकरण ने ग्रामीण जीवन को काफ़ी हद तक निगल लिया है। गाँवों में शहरी जीवन की नकल की जाती है, जिससे वहाँ की सरलता तथा उल्लासपूर्ण जीवन खो गय है, लोग अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए अपनी संस्कृति से दूर हो रहे हैं। लोकगीतों के माध्यम से देहातों में फैला जीवन अब विशेष अवसरों पर ही दिखाई देता है । कुछ लोग लोकगीतों को फिर से लोगों का सिरमौर बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। वे लोकगायकों और गीतों को इकट्ठा कर रहे हैं। वे उन्हें इसे अपनी जीविका का साधन बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिससे लोक गीतों में पहले जैसी सरलता, आनंद, लोच सुनाई और दिखाई दे।
भारत के मानचित्र में
- भारत के नक्शे में पाठ में चर्चित राज्यों के लोकगीत और नृत्य दिखाओ। –
उत्तर- विद्यार्थी स्वयं करें ।
भाषा की बात
- ‘लोक‘ शब्द में कुछ जोड़कर जितने शब्द तुम्हें सूझें, उनकी सूची बनाओ। इन शब्दों को ध्यान से देखो और समझो कि उनमें अर्थ की दृष्टि से क्या समानता है । इन शब्दों से वाक्य भी बनाओ । जैसे – लोककला ।
उत्तर—’लोक’ शब्द को जोड़कर लोकगीत, लोक जीवन, लोक नृत्य, लोक कथा, लोक साहित्य तथा लोक गायक शब्द बनते हैं। इन शब्दों में बहुत समानता है क्योंकि सभी शब्द आम आदमी के जीवन को दिखाते हैं।
लोकगीत— लोकगीतों में देहाती जीवन का सरल और स्वच्छ रूप देखने को मिलता है।
लोकजीवन— बढ़ते शहरीकरण ने प्रगति के नाम पर लोकजीवन की सहजता को समाप्त कर दिया है ।
लोकसाहित्य— बच्चों को अपनी पुरानी सभ्यता की जानकारी लोकसाहित्य से मिलती है।
लोककथा— लोककथाओं से किसी भी समाज की दशा का ज्ञान हो जाता है।
Lokgeet Class 6th Hindi Chapter 10 Question Answers के बारे में बस इतना ही। आशा है कि आपको यह उपयोगी लगा होगा। आप इस पोस्ट के बारे में अपने विचार नीचे टिप्पणी अनुभाग (comment section) में साझा करें।
Leave a Reply