“दोहा एकादश” JKBOSE की कक्षा 7 (Class 7th of JKBOSE) के छात्रों की पाठ्य-पुस्तक पुष्प भाग 2 हिंदी का तेरहवां अध्याय है। यह पोस्ट Doha Ekadash Class 7 Hindi Chapter 13 Question Answers के बारे में है। इस पोस्ट में आप पाठ “दोहा एकादश” के शब्दार्थ, सरलार्थ और उससे जुड़े कुछ प्रश्न उत्तर पढ़ेंगे। पढ़ेंगे। पिछली पोस्ट में, आपने Data Ranpat Class 7 Hindi Chapter 12 Question Answers के बारे में पढ़ा। आइए शुरू करें:

Doha Ekadash Class 7 Hindi Chapter 13 Question Answers
Doha Ekadash Class 7 Hindi Chapter Summary
दोहों का सार
कबीर जी कहते हैं कि सत्य बोलने से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलना सबसे बड़ा पाप है। जो व्यक्ति हमेशा सच बोलता है, उसके हृदय में ईश्वर का वास होता है। इसलिए हमें बोलने से पहले अच्छी तरह सोच लेना चाहिए।
कबीर जी हमें समय का महत्व भी समझाते हैं। उनका कहना है कि जो काम कल करना है, उसे आज ही कर लेना चाहिए और जो काम आज करना है, उसे अभी पूरा कर लेना चाहिए, क्योंकि मृत्यु कब आएगी, यह किसी को पता नहीं होता।
मनुष्य को ईश्वर से इतना ही धन माँगना चाहिए जिससे उसका और उसके परिवार का जीवन ठीक से चल सके तथा वह जरूरतमंद लोगों की भी सहायता कर सके। कबीर जी निंदा करने वाले लोगों को भी उपयोगी मानते हैं, क्योंकि उनकी बातें हमें अपनी कमियों और बुराइयों को पहचानकर उन्हें सुधारने में मदद करती हैं।
हमें दूसरों की गलतियाँ देखने के बजाय अपनी कमियों को पहचानना और उन्हें दूर करना चाहिए। अच्छे और गुणवान व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके अच्छे स्वभाव और व्यवहार से होती है। केवल माला जपने या अन्य बाहरी दिखावे करने से कोई सच्चा भक्त नहीं बनता। इसके लिए मन को शुद्ध और अच्छा बनाना आवश्यक है।
कबीर जी के अनुसार सज्जन व्यक्ति सोने के समान होते हैं, जो टूटने के बाद भी फिर से जुड़ सकते हैं। इसके विपरीत दुर्जन व्यक्ति मिट्टी के घड़े जैसे होते हैं, जो एक छोटी-सी ठोकर लगने पर ही टूट जाते हैं। इसलिए हमें कभी किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि छोटी-सी वस्तु भी, जैसे तिनका, यदि आँख में पड़ जाए तो बहुत पीड़ा दे सकता है।
Doha Ekadash Class 7 Hindi Chapter Explanation.
दोहों का सप्रसंग सरलार्थ एवं अर्थवग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
- साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदैं सांच है, ताके हिरदै आप ॥
शब्दार्थ – सांच = सच । हिरदै = हृदय, दिल। तप = तपस्या । जाके = जिसके। ताके = उसके। आप = स्वयं ईश्वर।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2‘ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा एकादश‘ से लिया गया है। इस दोहे के माध्यम से कबीर जी ने मनुष्य को सत्य का मार्ग अपनाने तथा झूठ से दूर रहने की सीख दी है। उन्होंने सत्य को सबसे बड़ी तपस्या और झूठ को सबसे बड़ा पाप बताया है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि संसार में सत्य बोलने से बड़ी कोई तपस्या नहीं है और झूठ बोलने से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिस व्यक्ति के मन में सच्चाई होती है, उसके हृदय में स्वयं परमात्मा का निवास होता है। इसलिए हमें हमेशा सत्य बोलना और सच्चाई के मार्ग पर चलना चाहिए।
- बोली एक अमोल है, जो कोई बोले जानि ।
हिये तराजू तोल के, तब मुख बाहर आनि ॥
शब्दार्थ – अमोल = अमूल्य । हियै = हृदय । मुख = मुँह ।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इसमें कबीर जी ने वाणी के महत्त्व को समझाते हुए सोच-समझकर बोलने की शिक्षा दी है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि मनुष्य की वाणी बहुत मूल्यवान होती है। इसलिए हमें कोई भी बात बिना सोचे-समझे नहीं कहनी चाहिए। बोलने से पहले अपने शब्दों को अच्छी तरह सोच-विचार कर लेना चाहिए, ताकि हमारी बात से किसी को दुख न पहुँचे।
- अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप ।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ॥
शब्दार्थ – अति = बहुत ज्यादा। भला: ‘ = अच्छा। चूप = चुप्पी | बरसना = वर्षा होना ।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इस दोहे में कबीर जी ने मनुष्य को हर कार्य में अति से बचने और संतुलित व्यवहार करने की सीख दी है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न ही हमेशा चुप रहना उचित है। इसी प्रकार बहुत अधिक वर्षा और बहुत तेज धूप भी अच्छी नहीं होती। जीवन में हर चीज की उचित मात्रा ही लाभदायक होती है। इसलिए हमें किसी भी बात में अति नहीं करनी चाहिए।
- काल करै सो आज कर, आज करै सो अब्ब,
पल में परलै होयगी, बहुरि करेगा कब्ब ॥
शब्दार्थ — काल्ह = कल । अब्ब = अभी। पल में = थोड़ी-सी देर में। परलै = प्रलय । कब्ब= कब। बहुरि = बाद।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इस दोहे में कबीर जी ने समय के महत्त्व को बताते हुए काम को टालने से बचने की सीख दी है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि जो काम कल करना है, उसे आज ही कर लेना चाहिए और जो काम आज करना है, उसे अभी पूरा कर लेना चाहिए। मनुष्य का जीवन और समय दोनों अनिश्चित हैं। यदि अचानक जीवन समाप्त हो गया, तो अधूरा काम फिर कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा। इसलिए किसी काम को टालना नहीं चाहिए।
- सांईं इतना दीजिए, जामें कुटुम समाय,
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ॥
शब्दार्थ – साईं = स्वामी, भगवान्। कुटुम= परिवार । साधु = संत / सज्जन ।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इसमें कबीर जी ने संतोषपूर्ण जीवन जीने तथा आवश्यकता से अधिक धन-संपत्ति का संग्रह न करने की भावना व्यक्त की है।
सरलार्थ – कबीर जी भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मुझे इतना ही धन दीजिए जिससे मेरे परिवार का पालन-पोषण अच्छी तरह हो सके। मेरे परिवार को भोजन मिल जाए और मेरे घर से कोई जरूरतमंद या साधु भी भूखा न जाए। कवि आवश्यकता भर धन और दूसरों की सहायता करने की भावना को महत्त्व देते हैं।
- निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय ।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ॥
शब्दार्थ – निंदक = निंदा करने वाला। नियरे = निकट, पास। कुटी = कुटिया । निर्मल = पवित्र । सुभाव = स्वभाव।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इसमें कबीर जी ने निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखने की सलाह दी है, क्योंकि उसकी बातों से हमें अपनी कमियों का पता चलता है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि जो व्यक्ति हमारी कमियाँ बताता है, उसे अपने पास रखना चाहिए। वह बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को साफ करने में मदद करता है। उसकी बातों से हमें अपनी गलतियों का पता चलता है और हम उन्हें सुधार सकते हैं।
- दोस पराये देखि करि, चला हसत-हसत ।
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ॥
शब्दार्थ – दोष = बुराई। पराए = दूसरों के। हसँत = हँसते हुए। आदि = शुरू, आरम्भ। अंत = समाप्ति ।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इसमें कबीर जी ने मनुष्य की उस आदत पर प्रकाश डाला है जिसमें वह अपनी कमियों को भूलकर दूसरों के दोषों को खोजता रहता है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि मनुष्य दूसरों की गलतियाँ देखकर उनका मजाक उड़ाता है, लेकिन अपनी कमियों पर ध्यान नहीं देता। जबकि उसके अंदर स्वयं अनेक दोष होते हैं। इसलिए हमें दूसरों की बुराइयाँ देखने के बजाय पहले अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करना चाहिए।
- जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥
शब्दार्थ – साधु = सज्जन। ज्ञान =विद्वता । तलवार = कृपाण । म्यान = खोल।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इसमें कबीर जी ने जाति-पाति के भेदभाव का विरोध करते हुए व्यक्ति के ज्ञान और गुणों को महत्त्व देने की शिक्षा दी है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि किसी साधु या सज्जन व्यक्ति की जाति नहीं पूछनी चाहिए, बल्कि उसके ज्ञान और गुणों को देखना चाहिए। जिस प्रकार तलवार की कीमत उसकी धार के कारण होती है, म्यान के कारण नहीं, उसी प्रकार मनुष्य का मूल्य उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके ज्ञान, गुण और अच्छे व्यवहार से होता है।
- माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर ॥
शब्दार्थ – फेरत = फिराना, घुमाना। जुग = युग। फिरा = खत्म हुआ। कर = हाथ। मनका = माला का दाना। डारि दै = छोड़ दे। मन का = दिल का ।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इसमें कबीर जी ने केवल बाहरी धार्मिक आडंबर करने के बजाय मन को शुद्ध और एकाग्र करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि व्यक्ति लंबे समय तक हाथ में माला लेकर उसके मनके फेरता रहा, लेकिन उसके मन में कोई परिवर्तन नहीं आया। इसलिए केवल माला फेरना ही पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को अपने मन की बुराइयों और अशुद्ध विचारों को दूर करके मन को ईश्वर की ओर लगाना चाहिए।
- सोना, सज्जन, साधुजन, छटि जुरै सौ बार ।
दुर्जन कुंभ एकै कुम्हार के, एकै धका दरार ।
शब्दार्थ – सज्जन = भले आदमी। जुरै = जुड़ना। दुर्जन = बुरा आदमी। कुंभ = घड़ा। कुम्हार = मिट्टी के घड़े बनाने वाला। दरार = दरज ।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इसमें कबीर जी ने सज्जन और दुर्जन व्यक्तियों के स्वभाव में अंतर को स्पष्ट करने के लिए सोने और मिट्टी के घड़े का उदाहरण दिया है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि सोना और सज्जन व्यक्ति टूटने के बाद भी बार-बार जोड़े जा सकते हैं। इसी प्रकार अच्छे और सज्जन लोग किसी परेशानी या मतभेद के बाद भी अपने संबंधों को सुधार लेते हैं। इसके विपरीत दुर्जन व्यक्ति कच्चे मिट्टी के घड़े के समान होते हैं, जो थोड़ी-सी चोट लगने पर ही टूट जाते हैं और आसानी से नहीं जुड़ते।
- तिनका कबहुँ न निंदिए, जो पायन तर होय ।
कबहूँ उड़ि आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥
शब्दार्थ – कबहुँ = कभी भी। निंदिए = निंदा करिए। पायन = पैरों में। तर = नीचे। कबहूँ = कभी भी। आँखिन = आँखों में। पीर = पीड़ा, दर्द। घनेरी = बहुत ज्यादा ।
प्रसंग – प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘पुष्प भाग 2’ में संकलित कबीरदास जी के ‘दोहा-एकादश‘ से लिया गया है। इसमें कबीर जी ने किसी भी व्यक्ति या वस्तु को छोटा समझकर उसका अपमान अथवा निंदा न करने की सीख दी है।
सरलार्थ – कबीर जी कहते हैं कि पैरों के नीचे पड़े एक छोटे-से तिनके की भी निंदा नहीं करनी चाहिए। यदि वही तिनका उड़कर आँख में चला जाए तो बहुत पीड़ा दे सकता है। इसलिए हमें किसी व्यक्ति को छोटा या कमजोर समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि छोटी-सी चीज भी कभी बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है।
शब्द-अर्थ-
शब्द अर्थ
- साँच सत्य / सच्चाई
- काल कल
- कुटुभ कुटुंब / परिवार
- नियेरे पास
- छबाय बनाकर
- मनका मौती के दाने
- दुर्जन दुष्ट
- पीर पीड़ा
- घनेरी बहुत / घनी
Doha Ekadash Class 7 Hindi Chapter Question Answers
अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
बोध और सराहना
प्रश्न 1. कबीर ने किसके हृदय में भगवान् को स्थित माना है ?
(क) जो पाप नहीं करता।
(ख) जो बहुत कम झूठ बोलता है।
(ग) जो तप करता है।
(घ) जिनके हृदय में सच्चाई है।
उत्तर – (घ) जिसके हृदय में सच्चाई है।
प्रश्न 2. कवि ने अत्यधिक बोलना और अत्यधिक चुप रहना दोनों को ही त्याज्य क्यों बताया है ?
उत्तर— अत्यधिक बोलने से लोग बातूनी समझते हैं। अत्यधिक चुप रहने वाले को लोग गूँगा या मूर्ख समझते हैं, इसलिए कवि ने इन दोनों की अधिकता को त्याज्य बताया है।
प्रश्न 3. निम्नांकित कथनों के लिए कवि ने क्या तर्क दिए हैं ?
(क) हे ईश्वर! मुझे इतनी ही संपत्ति दीजिए…..।
(ख) अपने निंदक को अपने समीप ही बनाए रखिए, क्योंकि … ।
(ग) साधु की जाति न पूछ कर…….।
(घ) माला के मनके को फिराना छोड़कर……।
उत्तर- (क) कबीर जी अधिक संचय के विरोधी थे । इसलिए उन्होंने कहा है-हे ईश्वर ! मुझे उतनी ही संपत्ति दीजिए जिससे परिवार का निर्वाह भली-भांति हो सके और घर में आया मेहमान भी भूखा न जाए।
(ख) क्योंकि उससे मनुष्य का स्वभाव निर्मल बन जाता है।
(ग) साधु की जाति न पूछ कर उससे ज्ञान के विषय में पूछना चाहिए। (घ) कबीर जी का कहना है कि माला के मनके को फेरना छोड़ कर, मन के मनके को फेरो ।
प्रश्न 4. “सोना, सज्जन, साधुजन, टूटि जुरै सौ बार ।
दुर्जन, कुंभ, कुम्हार के, एके धका दरार।“
उपर्युक्त दोहे में सज्जन को सोना और दुर्जन को कुम्हार का घड़ा क्यों कहा गया है?
उत्तर – सज्जन को सोना और दुर्जन को कुम्हार का घड़ा इसलिए कहा गया है, क्योंकि सोने के सौ टुकड़े हो जाने पर भी उसे पुन: जोड़ा जा सकता है, जबकि कुम्हार का घड़ा यदि एक बार टूट जाए तो वह बेकार हो जाता है, उसे पुनः जोड़ा नहीं जा सकता।
प्रश्न 5. ‘तिनका कबहूँ न निंदिए‘ दोहे में किस बात की ओर संकेत किया गया है ?
उत्तर – तुच्छ और दीन-हीन व्यक्ति को अधिक दबाना नहीं चाहिए, क्योंकि किसी दिन उसमें भी प्रतिहिंसा जाग सकती है और वह कष्ट का कारण बन सकता है।
प्रश्न 6. निम्नलिखित से संबंधित दोहों का चयन करें-
(क) आज का काम कल पर नहीं छोड़ना चाहिए ।
(ख) कोई बात सोच-समझकर बोलनी चाहिए ।
(ग) दूसरों के दोष देखने के बजाए अपना दोष देखना हितकर है।
(घ) दीन-हीन और निर्धन को अधिक दबाना नहीं चाहिए, क्योंकि किसी दिन उसमें प्रतिहिंसा जाग सकती है और वह आपके लिए सिर दर्द बन सकता है।
उत्तर-
(क) दोहा संख्या 4 ।
(ख) दोहा संख्या 2 ।
(ग) दोहा संख्या 7 ।
(घ) दोहा संख्या 11 ।
योग्यता- विस्तार
- मीठी वाणी के महत्व पर कबीर, तुलसी और रहीम के दो-दो दोहों का संग्रह करें।
- कबीर के ऐसे पाँच दोहों का संग्रह करें, जिनमें भक्ति के बाह्य आडंबरों का विरोध किया गया हो। इन दोहों को कंठस्थ करके कक्षा में सुनाएँ ।
बहुविकल्पी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. दोहा एकादश कविता के कवि हैं।
(क) कबीर दास
(ख) रामावतार त्यागी
(ग) सुमित्रानंदन पंत
(घ) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर- (क) कबीर दास ।
प्रश्न 2. सोना क्या है ?
(क) क्रिया
(ख) कार्य
(ग) बहुमूल्य धातु
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर- (ग) बहुमूल्य धातु ।
प्रश्न 3. कवि ने दुर्जन किसे कहा ?
(क) माला के मनकों को घुमाना
(ख) मन का मैल
(ग) कुम्हार के घड़े को
(घ) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर- (ग) कुम्हार के घड़े को ।
प्रश्न 4. क्या करते युग बीत गया ?
(क) भाग दौड़
(ख) पैसा कमाते हुए
(ग) पारिवारिक देखरेख
(घ) माला फेरते हुए।
उत्तर- (घ) माला फेरते हुए ।
प्रश्न 5. किस की निंदा नहीं करनी चाहिए ?
(क) तुच्छ से तुच्छ वस्तु की
(ख) व्यक्ति की
(ग) (क) और (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर- (ग) (क) और (ख) दोनों।
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