कविता “दीवानों की हस्ती” JKBOSE के कक्षा 8 (Class 8th of JKBOSE) के छात्रों की पाठ्य-पुस्तक पुष्प भाग 2 हिंदी का चौथा अध्याय है। यह कविता भगवतीचरण वर्मा द्वारा लिखित है। यह पोस्ट Diwano Ki Hasti Class 8 Chapter 4 Question Answers के बारे में है। इस पोस्ट में कविता”दीवानों की हस्ती” के शब्दार्थ, सरलार्थ और उससे जुड़े कुछ प्रश्न उत्तर पढ़ेंगे। पढ़ेंगे। पिछली पोस्ट में, आपने Aprajita Class 8 Hindi Chapter 3 Question Answers के बारे में पढ़ा। आइए शुरू करें:

Diwano Ki Hasti Class 8 Chapter 4 Question Answers
Diwano Ki Hasti Class 8 Chapter 4 Summary
कविता का सारा प्रतिपाद्य
‘दीवानों की हस्ती’ कविता श्री भगवतीचरण वर्मा द्वारा रचित एक सुंदर और भावपूर्ण कविता है। इसमें कवि ने दीवानों के मस्तमौला, स्वतंत्र और बेफिक्र स्वभाव का चित्रण किया है।
कवि कहता है कि दीवानों का कोई निश्चित ठिकाना नहीं होता। वे आज एक स्थान पर होते हैं तो कल किसी दूसरे स्थान की ओर चल पड़ते हैं। वे जहाँ भी जाते हैं, अपने साथ खुशी, उत्साह और मस्ती का वातावरण लेकर जाते हैं। कभी वे खुशी के रूप में आते हैं तो कभी आँसुओं के रूप में अपने पीछे दुख की छाप छोड़ जाते हैं। संसार के लोग उनके आने-जाने का कारण जानना चाहते हैं, लेकिन दीवाने किसी एक स्थान या उद्देश्य से बँधे नहीं होते।
दीवाने निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं। वे संसार से कुछ सीखते हैं और बदले में अपने अनुभव तथा सीख दूसरों को देकर आगे निकल जाते हैं। जीवन में उन्हें सुख-दुःख दोनों का सामना करना पड़ता है, फिर भी वे दोनों को समान भाव से स्वीकार करके उत्साह और उमंग के साथ आगे बढ़ते रहते हैं।
कवि के अनुसार यह संसार स्वार्थ और बंधनों से भरा हुआ है, लेकिन दीवाने इन बंधनों से मुक्त होकर प्रेम बाँटते हुए जीवन जीते हैं। उनके लिए मेरा-तेरा, अपना-पराया जैसे भावों का कोई महत्व नहीं है। वे अपने जीवन की असफलताओं और कठिनाइयों का भार लेकर भी रुकते नहीं, बल्कि निरंतर आगे बढ़ते जाते हैं।
अंत में कवि कहता है कि दीवानों ने अपने सभी बंधन स्वयं तोड़ दिए हैं। अब वे किसी एक स्थान पर रुकना नहीं चाहते। वे स्वतंत्र होकर जीवन की राह पर आगे बढ़ते रहते हैं और पीछे रह जाने वालों के सुखी रहने की कामना करते हैं।
Diwano Ki Hasti Class 8 Chapter 4 Paragraph Explanation
काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या
- हम दीवानों की क्या हस्ती,
हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले,
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले।
शब्दार्थ- हस्ती = अस्तित्व, हैसियत। आलम = दशा, अवस्था। मस्ती = मतवालापन, मद, मस्त होने की क्रिया। धूल उड़ाना = मदमस्त होकर चलना। दीवाना = विक्षिप्त, किसी वस्तु के लिए व्यग्र होना, पागलपन।
प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘दीवानों की हस्ती’ नामक कविता से लिया गया है। इसके रचयिता श्री भगवतीचरण वर्मा हैं। इस कविता में कवि ने ऐसे मस्तमौला और स्वतंत्र विचारों वाले लोगों के जीवन का चित्रण किया है, जो किसी एक स्थान या बंधन में टिककर नहीं रहते।
व्याख्या — कवि कहता है कि हम दीवानों का कोई निश्चित अस्तित्व या ठिकाना नहीं है। हम आज एक स्थान पर रहते हैं तो अगले दिन किसी दूसरे स्थान की ओर चल पड़ते हैं। हमारा जीवन किसी एक जगह रुकने वाला नहीं है। हम जहाँ भी जाते हैं, वहाँ अपने साथ मस्ती, उत्साह और उमंग का वातावरण भी ले जाते हैं। हमारे चलने से ऐसा लगता है जैसे हम अपने पीछे धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ रहे हों। भाव यह है कि दीवाने व्यक्ति जीवन में किसी बंधन की परवाह नहीं करते और अपनी मस्ती तथा स्वतंत्रता के साथ निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं।
- आए बनकर उल्लास अभी,
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए अरे,
तुम कैसे आए, कहाँ चले ?
शब्दार्थ- उल्लास = खुशी, आनंद।
प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘दीवानों की हस्ती’ कविता से लिया गया है। इसके कवि भगवतीचरण वर्मा हैं। इस कविता में कवि ने दीवानों के मस्त और स्वतंत्र स्वभाव तथा उनके जीवन में आने वाले सुख-दुःख का चित्रण किया है।
व्याख्या — कवि कहता है कि हम कभी उल्लास, खुशी और आनंद के रूप में लोगों के बीच आते हैं और कभी आँसू तथा दुःख बनकर बह जाते हैं। हमारे जीवन में सुख और दुःख दोनों अचानक आते-जाते रहते हैं। हमारे इस प्रकार आने और चले जाने को देखकर संसार के लोग आश्चर्य से पूछते रह जाते हैं कि तुम कहाँ से आए हो और अब कहाँ जा रहे हो। भाव यह है कि दीवानों का जीवन निश्चित नियमों और स्थायी ठिकानों से बँधा नहीं होता। वे परिस्थितियों के अनुसार कभी खुशी बाँटते हैं तो कभी दुःख का अनुभव करते हुए आगे बढ़ जाते हैं।
- किस ओर चले ? यह मत पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले,
शब्दार्थ – जग = संसार, दुनिया।
प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘दीवानों की हस्ती’ कविता से लिया गया है। इसके रचयिता भगवतीचरण वर्मा हैं। इस कविता में कवि ने जीवन के प्रति दीवानों के स्वतंत्र और गतिशील दृष्टिकोण को व्यक्त किया है।
व्याख्या — कवि कहता है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं और कहाँ पहुँचेंगे, यह मत पूछो। हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें चलते रहना है, इसलिए हम निरंतर आगे बढ़ते जा रहे हैं। हम संसार से बहुत-सी बातें, अनुभव और सीख प्राप्त करते हैं और बदले में अपने विचार, अनुभव तथा गुण संसार को देकर आगे बढ़ जाते हैं। भाव यह है कि मनुष्य को जीवन में निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। उसे संसार से सीखना भी चाहिए और अपने ज्ञान तथा अनुभव से दूसरों को लाभ भी पहुँचाना चाहिए।
- दो बात कही, दो बात सुनी;
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए ।
छककर सुख-दुख के घूँटों को
हम एक भाव से पिए चले ।
शब्दार्थ – छककर = अच्छी प्रकार तृप्त होकर । पिए = पीना।
प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘दीवानों की हस्ती’ कविता से लिया गया है। इसके कवि भगवतीचरण वर्मा हैं। इस पद्यांश में कवि ने जीवन में मिलने वाले सुख-दुःख और उनके प्रति अपने समान भाव का वर्णन किया है।
व्याख्या — कवि कहता है कि जीवन की यात्रा में हमने लोगों से अपनी कुछ बातें कहीं और उनकी कुछ बातें सुनीं। इन बातचीतों के दौरान कभी हँसी के अवसर आए तो कभी दुःख के कारण आँसू भी आए। इस प्रकार जीवन में हमें सुख और दुःख दोनों का अनुभव हुआ। फिर भी हमने इन दोनों परिस्थितियों को समान भाव से स्वीकार किया। हमने सुख और दुःख को पूरी तरह अनुभव किया और उनसे तृप्त होकर बिना रुके अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते गए। भाव यह है कि जीवन में सुख और दुःख दोनों आते रहते हैं, इसलिए मनुष्य को दोनों परिस्थितियों में संतुलित रहकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए।
- हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले,
हम एक निसानी-सी उर पर,
ले असफलता का भार चले।
शब्दार्थ – भिखमंगों = भिखारी। स्वच्छंद = स्वतंत्र। निसानी = चिह्न। उर = हृदय। असफलता = निराशा। भार = वज़न, बोझ।
प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘दीवानों की हस्ती’ कविता से लिया गया है। इसके रचयिता भगवतीचरण वर्मा हैं। इस पद्यांश में कवि ने संसार के प्रति अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण, प्रेम और जीवन में मिली असफलताओं का वर्णन किया है।
व्याख्या — कवि कहता है कि यह संसार ऐसे लोगों से भरा हुआ है जो दूसरों के सामने अपनी इच्छाएँ और स्वार्थ लेकर खड़े रहते हैं। ऐसे संसार में भी हम स्वतंत्र होकर सभी के प्रति अपना प्रेम लुटाते हुए आगे बढ़ते हैं। हमारे मन में किसी के प्रति भेदभाव या स्वार्थ नहीं है। हम सभी को समान रूप से प्रेम और अपनापन देते हैं। इसके साथ ही हम अपने हृदय में जीवन की असफलताओं और उनसे मिली निराशाओं की निशानी भी लिए हुए हैं। भाव यह है कि अनेक असफलताओं और कठिनाइयों के बावजूद कवि निराश होकर रुकता नहीं, बल्कि प्रेम बाँटते हुए अपनी जीवन-यात्रा पर आगे बढ़ता रहता है।
- अब अपना और पराया क्या ?
आबाद रहें रुकने वाले !
हम स्वयं बँधे थे और स्वयं
हम अपने बंधन तोड़ चले।
शब्दार्थ – अपना = स्वयं का। पराया = दूसरे का। आबाद = खुश रहो। बंधन = बेड़ियाँ, रुकावटें।
प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘दीवानों की हस्ती’ कविता से लिया गया है। इसके कवि भगवतीचरण वर्मा हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपने-पराए के भेद से ऊपर उठकर स्वतंत्र जीवन जीने और बंधनों को तोड़कर आगे बढ़ने की भावना व्यक्त की है।
व्याख्या — कवि कहता है कि अब इस संसार में अपना और पराया क्या रह गया है? उसके लिए सभी समान हैं और अब उसके मन में मेरा-तेरा या अपने-पराए का कोई भेद नहीं है। वह संसार में रहने वाले लोगों को सुखी और खुश रहने की शुभकामना देता है। कवि स्वीकार करता है कि कभी वह स्वयं भी अनेक बंधनों में बँधा हुआ था, लेकिन अब उसने उन सभी बंधनों को स्वयं तोड़ दिया है। अब वह किसी मोह, स्वार्थ या रुकावट से बँधा नहीं है और स्वतंत्र होकर अपनी राह पर आगे बढ़ रहा है। भाव यह है कि सच्ची स्वतंत्रता तभी प्राप्त होती है, जब मनुष्य अपने मोह-माया और अनावश्यक बंधनों से मुक्त होकर अपने जीवन-पथ पर आगे बढ़ता है।
Diwano Ki Hasti Class 8 Chapter Question Answers
अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
कविता से
प्रश्न 1. कवि ने अपने आने को ‘उल्लास’ और जाने को ‘आँसू बनकर बह जाना’ क्यों कहा है ?
उत्तर— कवि ने अपने आने को ‘उल्लास’ इसलिए कहा है क्योंकि उसके आने से लोगों के मन में खुशी, उत्साह और आनंद का संचार होता है। उसके आने से लोगों के चेहरे खिल उठते हैं और वातावरण प्रसन्नता से भर जाता है। इसके विपरीत, उसके जाने से लोगों के मन में दुःख और उदासी छा जाती है। लोग उसके जाने से उत्पन्न कमी को महसूस करते हैं। इसी कारण कवि ने अपने जाने को ‘आँसू बनकर बह जाना’ कहा है।
प्रश्न 2. भिखमंगों की दुनिया में बेरोक प्यार लुटानेवाला कवि ऐसा क्यों कहता है कि वह अपने हृदय पर असफलता का एक निशान भार की तरह लेकर जा रहा है ? क्या वह निराश है या प्रसन्न है ?
उत्तर— कवि इस स्वार्थी संसार में बिना किसी भेदभाव के सभी लोगों को अपना प्रेम बाँटना चाहता है। वह अपने प्रेम से लोगों के जीवन में खुशी लाना चाहता है, लेकिन उसे लगता है कि वह अपने इस उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया। इसलिए वह अपनी असफलता को हृदय पर एक निशान और भार के रूप में लेकर आगे बढ़ता है। यह उसके मन की निराशा और हताशा को व्यक्त करता है। फिर भी वह पूरी तरह निराश होकर रुकता नहीं, बल्कि जीवन की कठिनाइयों और असफलताओं को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ता रहता है।
प्रश्न 3. कविता में ऐसी कौन-सी बात है जो आपको सबसे अच्छी लगी ?
उत्तर— भगवतीचरण वर्मा की ‘दीवानों की हस्ती’ कविता में अनेक बातें प्रेरणादायक हैं, लेकिन मुझे कवि की स्वतंत्र होकर दूसरों के प्रति प्रेम बाँटने की भावना सबसे अच्छी लगी। कवि संसार में बिना किसी स्वार्थ और भेदभाव के अपना प्यार लुटाते हुए आगे बढ़ना चाहता है। वह जीवन में मिली असफलताओं को अपने हृदय पर लेकर भी रुकता नहीं है। यह भावना हमें सिखाती है कि मनुष्य को कठिनाइयों और असफलताओं से निराश होकर रुकना नहीं चाहिए, बल्कि प्रेम, उत्साह और स्वतंत्रता के साथ निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
कविता से आगे
- जीवन में मस्ती होनी चाहिए, लेकिन कब मस्ती हानिकारक हो सकती है ? सहपाठियों के बीच चर्चा कीजिए।
उत्तर— जीवन में मस्ती और प्रसन्नता का होना आवश्यक है, क्योंकि इससे जीवन आनंदमय और उत्साहपूर्ण बना रहता है। खेलना, मनोरंजन करना, मित्रों के साथ हँसी-मजाक करना आदि मस्ती के स्वस्थ रूप हैं। इससे मन प्रसन्न रहता है और व्यक्ति नई ऊर्जा के साथ अपने कार्य करता है।
लेकिन जब मस्ती अनुशासन की सीमा पार कर जाए और व्यक्ति अपने आवश्यक कार्यों, पढ़ाई या जिम्मेदारियों की उपेक्षा करने लगे, तब यह हानिकारक हो सकती है। ऐसी मस्ती व्यक्ति को अपने लक्ष्य से भटका सकती है और उसके लिए परेशानी का कारण बन सकती है। इसलिए हमें ऐसी मस्ती करनी चाहिए जो हमारे मन को खुशी दे, लेकिन साथ ही हमें अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति भी सजग रखे।
अनुमान और कल्पना
एक पंक्ति में कवि ने यह कहकर अपने अस्तित्व को नकारा है कि “हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले।” दूसरी पंक्ति में उसने यह कहकर अपने अस्तित्व को महत्त्व दिया है कि “मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले।” यह फाकामस्ती का उदाहरण है । अभाव में भी खुश रहना फाकामस्ती कही जाती है। कविता में इस प्रकार की अन्य पंक्तियाँ भी हैं, उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और अनुमान लगाइए कि कविता में परस्पर विरोधी बातें क्यों की गई हैं ?
उत्तर—प्रत्येक व्यक्ति के किसी एक वस्तु के बारे में ही अलग-अलग विचार होते हैं। उसके सुख-दुःख भिन्न होते हैं। उसका जीवन जीने का ढंग अलग होता है। किसी एक व्यक्ति को जिस काम में सुख का अहसास होता है, दूसरे व्यक्ति को उससे दुःख मिलता है। कोई एक बात किसी को हंसाती है तो वही दूसरे को रुलाती है। कोई किसी के सुख से सुखी होता है तो कोई दुःखी होता है। इसलिए कवि ने परस्पर विरोधी बातें की हैं।
भाषा की बात
- संतुष्टि के लिए कवि ने ‘छककर‘ ‘जी भरकर‘ और ‘खुलकर‘ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। इसी भाव को व्यक्त करने वाले कुछ और शब्द सोचकर लिखिए। जैसे – हँसकर, गाकर।
उत्तर—बनकर, लुटाकर, सुनाकर, उड़ाकर, रोककर, पेट भरकर, बुलाकर, उठाकर।
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें
- ‘दीवानों की हस्ती‘ कविता के कवि …………….. हैं।
- मस्ती का …………… साथ चला।
- आए बनकर …………… अभी।
- छक-कर …………… के घूँटों को ।
- हम अपना …………… तोड़ चले।
उत्तर-
- ‘दीवानों की हस्ती’ कविता के कवि भगवतीचरण वर्मा हैं।
- मस्ती का आलम साथ चला।
- आए बनकर उल्लास अभी।
- छक-कर सुख-दुःख के घूँटों को।
- हम अपना बंधन तोड़ चले।
बहु-विकल्पीय प्रश्न
- ‘दीवानों की हस्ती‘ कविता के कवि हैं-
(क) भगवती प्रसाद वर्मा
(ख) भगवती शरण वर्मा
(ग) भगवती चरण वर्मा
(घ) भगवती प्रकाश वर्मा।
उत्तर- (ग) भगवती चरण वर्मा
- दीवानों के साथ किसका ‘आलम‘ चलता है?
(क) विश्राम
(ख) मस्ती
(ग) परिश्रम
(घ) आनंद।
उत्तर- (ख) मस्ती
- दीवानें क्या उड़ाते चलते हैं?
(क) धूल
(ख) प्रसन्नता
(ग) मस्ती
(घ) रंग।
उत्तर- (क) धूल
- दीवानें क्या बनकर आते हैं?
(क) उमंग
(ख) हैरानी
(ग) परेशानी
(घ) उल्लास।
उत्तर- (घ) उल्लास।
- दीवानें क्या बनकर बह जाते हैं?
(क) आँसू
(ख) अमृत
(ग) जल
(घ) दूध।
उत्तर- (क) आँसू
- दीवानें किस लिए चलते हैं क्योंकि उन्होंने केवल-
(क) टहलना है।
(ख) चलना है।
(ग) लक्ष्य पाना है
(घ) घर जाना है।
उत्तर- (ख) चलना है।
- दीवानें छककर किस का घूँट पीते हैं?
(क) दूध का
(ख) छाछ का
(ग) चाय का
(घ) सुख – दुःख का।
उत्तर- (घ) सुख – दुःख का ।
- दीवानें कितनी बातें कहते-सुनते हैं?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार।
उत्तर- (ख) दो
- दीवानें कैसी दुनिया में स्वच्छंद प्यार लुटा रहे हैं?
(क) प्रेमप्यासों की
(ख) मनमारों की
(ग) भिखमंगों की
(घ) दिलदारों की।
उत्तर- (ग) भिखमंगों की
- दीवानें किस का भार ले कर चलते हैं?
(क) असफलता
(ख) सफलता
(ग) प्रेम
(घ) घृणा।
उत्तर- (क) असफलता
Diwano Ki Hasti Class 8 Chapter 4 Question Answers के बारे में बस इतना ही। आशा है कि आपको यह उपयोगी लगा होगा। आप इस पोस्ट के बारे में अपने विचार नीचे टिप्पणी अनुभाग (comment section) में साझा करें।
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