“ओ नभ में मंडराते बादल” JKBOSE की कक्षा 8 (Class 8 of JKBOSE) के छात्रों की पाठ्यपुस्तक पुष्प भाग 2 हिंदी का चौदहवां अध्याय है। यह कविता रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ द्वारा लिखित है। यह पोस्ट O Nabh Mein Mandratey Badal Class 8 Question Answers के बारे में है। इस पोस्ट में पाठ”ओ नभ में मंडराते बादल” ” के शब्दार्थ, सरलार्थ और उससे जुड़े कुछ प्रश्न उत्तर पढ़ेंगे। पढ़ेंगे। पिछली पोस्ट में, आपने पोस्ट Akbari Lota Class 8 Chapter 13 Question Answers के बारे में पढ़ा। आइए शुरू करें:

O Nabh Mein Mandratey Badal Class 8 Question Answers
O Nabh Mein Mandratey Badal Class 8 Poem Summary
कविता का सार/भाव
‘ओ नभ में मंडराते बादल’ कविता के रचयिता श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ हैं। इस कविता में कवि ने बादलों के बरसने को कहा है। धरती प्यासी है। कवि उसकी प्यास बुझाने के लिए बादल को कहता है कि बिन बरसे मत जाना। पहाड़ पानी की बूँदों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। धूप में जले हुए जंगल पुकार रहे हैं।
आज मीठे सपनों में का आसमान भरा है। इसलिए है मस्त बादल ! बिना बरसे मत जाना। तुम्हारे आने से रेगिस्तान में सुख का आशा उठी है। भीषण गर्मी से प्रकृति का रोम-रोम झुलस रहा है । खेत-खलिहान और मुंडेरों पर खड़े अनगिनत लोग तुम्हे निहार रहे हैं। हे बादल ! तुम बरसो ताकि धरती का शरीर ठंडा हो जाए और मन की थकान मिट जाए।
O Nabh Mein Mandratey Badal Class 8 Poem Explanation
पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या
- ओ नभ में मंडराते बादल बे-बरसे मत जा।
मन के होठों पर रस की बिसरी पहचान जगा।
पुरवा की लहरों में सुख की आतुरता उमगा।
सूखे सुमनों की हरियाली का आभास दिखा।
खींच क्षितिज पर शीतलता की कज्जल धूमशिखा।
आज वर्ष की पहली वर्षा का पहला झोंका।
इतने दिन धरती ने प्रखर पिपासा को रोका
ओ नभ में मंडराते बादल बे-बरसे मत जा।
शब्दार्थ– नभ = आसमान। बिसरी = भूली। पुरवा = पूर्व दिशा में चलने वाली ठंडी हवा। कज्जल = काली। धूमशिखा = धुएँ की लौ। प्रखर = प्रचंड, तेज़। पिपासा = प्यास।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ की कविता ‘ओ नभ में मँडराते बादल’ से लिया गया है। इसमें कवि बादलों से धरती पर वर्षा करने का आग्रह करता है।
व्याख्या— कवि बादल से कहता है कि हे आकाश में मँडराने वाले बादल! बिना बरसे मत जाना। वर्षा की ठंडी बूँदों से लोगों को वर्षा के सुख का अनुभव कराओ। पुरवाई हवा के साथ सुख और प्रसन्नता की भावना जाग उठी है। सूखे फूल और धरती वर्षा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कवि चाहता है कि बादल वर्षा की पहली फुहार से धरती की प्यास बुझाएँ और वातावरण में शीतलता भर दें।
- कब से जल- -बूंदों को विह्वल शैल निहार रहे,
कब से आतप दग्ध वनों के प्राण पुकार रहे,
मन जलता है, जैसे तृष्णा का क्षण जलता है
सूखे मूल कगारों का वीरान मचलता है।
आज मधुर स्वप्नों में पावस का आकाश भरा।
गीतों की गूँजों से मर्मर का उल्लास हरा।
ओ मादक उन्मादक बादल बे-बरसे मत जा।
शब्दार्थ – विह्वल = व्याकुल। शैल = पर्वत। आतप दग्ध = गर्मी से व्याकुल। तृष्णा = इच्छा, चाहत। पावस = वर्षा ऋतु। कगारों = किनारों। उन्मादक = पागल करने वाला। उल्लास = खुशी।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ की कविता ‘ओ नभ में मँडराते बादल’ से लिया गया है। इसमें कवि वर्षा के लिए व्याकुल प्रकृति का चित्रण करते हुए बादलों से बरसने की प्रार्थना करता है।
व्याख्या— कवि कहता है कि पहाड़ बहुत समय से वर्षा की बूँदों की प्रतीक्षा कर रहे हैं और गर्मी से झुलसे वन भी पानी के लिए पुकार रहे हैं। भीषण गर्मी के कारण धरती और मन दोनों व्याकुल हैं। सूखे स्थान और नदी-किनारे भी वर्षा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बादलों को देखकर लोगों के मन में वर्षा की आशा जाग उठी है। कवि मस्त और आनंद देने वाले बादलों से आग्रह करता है कि वे बिना बरसे वापस न जाएँ।
- जाग उठी मरु – मरु में सुख की वाष्पाकुल आशा।
इस निदाघ से जला प्रकृति का रोम-रोम प्यासा।
थकी अनमनी धूप माँगती है जलमय बांहें।
डूब गई तम में नीड़ाकुल विहंगों की छाँहें।
खेतों-खलिहानों, मुँडेरों पर, छत पर, घर-घर।
हेर रहे अगणित हम तुमको जल वाले जलधर।
उमड़ बरसने वाले बादल बे-बरसे मत जा।
शब्दार्थ— मरु = रेगिस्तान। वाष्पाकुल = जिस प्रकार भाप ऊपर उठने के लिए बेचैन रहती है, उसी प्रकार की स्थिति। निदाघ = गर्मी। नीड़ाकुल = घोंसले की बेचैन। विहंग = पक्षी।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ की कविता ‘ओ नभ में मँडराते बादल’ से लिया गया है। इसमें कवि वर्षा की प्रतीक्षा कर रही प्रकृति और लोगों की स्थिति का वर्णन करता है।
व्याख्या— कवि कहता है कि बादलों के आने से रेगिस्तान और सूखी धरती में भी वर्षा की आशा जाग उठी है। भीषण गर्मी से प्रकृति का प्रत्येक कण प्यासा और थका हुआ है। धूप भी पानी से भरी बादलों की बाँहों की प्रतीक्षा कर रही है। पक्षी और मनुष्य भी वर्षा की आस लगाए हुए हैं। खेतों, खलिहानों, छतों और मुंडेरों से अनगिनत लोग बादलों को देख रहे हैं। इसलिए कवि बादलों से आग्रह करता है कि वे खूब बरसें और बिना बरसे न जाएँ।
- है अनदेखी बान तुम्हारी, तरसाते जग को
पुरवा की थपकी दे-देकर भरमाते जग को।
मन की बूँदों से कब तक जीवन को तृप्ति मिले।
कब तक जलती बालू पर यौवन का फूल खिले।
तुम बरसो फिर से धरती का तन शीतल हो ले।
तुम बरसो मन की थकान का मन मिश्री घोले।
ओ नभ में मँडराते बादल बे-बरसे मत जा।
शब्दार्थ – बान = आदत। भरमाते = भ्रम में डालते हैं। बालू = रेत। तृप्ति = संतोष, संतुष्टि। तन = शरीर।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ की कविता ‘ओ नभ में मँडराते बादल’ से लिया गया है। इसमें कवि बादलों से केवल दिखाई देकर चले जाने के बजाय वर्षा करने का आग्रह करता है।
व्याख्या— कवि कहता है कि बादलों की आदत है कि वे उमड़-घुमड़कर लोगों को वर्षा की आशा देते हैं और फिर बिना बरसे चले जाते हैं। केवल मन की कल्पनाओं से जीवन की प्यास नहीं बुझ सकती। जलती हुई धरती पर बिना वर्षा के सुख और नई उमंग का फूल नहीं खिल सकता। इसलिए कवि बादलों से बरसने की प्रार्थना करता है, ताकि धरती का शरीर ठंडा हो जाए, उसकी प्यास बुझ जाए और मन की थकान दूर होकर नई आशाएँ जाग उठें।
O Nabh Mein Mandratey Badal Class 8 Poem Question Answers
अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
बोध और सराहना
प्रश्न 1. इस गीत में कवि बादल से क्या-क्या आग्रह कर रहा है ?
अथवा
कवि बादल से क्या-क्या आग्रह कर रहा है ?
उत्तर— कवि बादल से धरती पर खूब बरसने का आग्रह कर रहा है। वह कहता है कि धरती और प्रकृति का कण-कण प्यासा है। इसलिए हे बादल! बिना बरसे वापस मत जाना और अपनी वर्षा से धरती की प्यास बुझा देना।
प्रश्न 2. वर्षा के बिना जड़-चेतन सभी किस प्रकार व्याकुल हो उठे हैं?
उत्तर— वर्षा के बिना पहाड़ पानी की बूँदों के लिए तरस रहे हैं और गर्मी से झुलसे वन पानी के लिए पुकार रहे हैं। सूखे नदी-किनारे और धरती का कण-कण प्यासा है। खेतों, घरों और छतों से लोग भी बादलों की ओर आशा से देख रहे हैं।
प्रश्न 3. तपती धरती और जलते मन-प्राणों में वर्षा की संभावना मात्र से क्या-क्या परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं ?
उत्तर— बादलों को देखकर तपती धरती और व्याकुल मन में वर्षा की आशा जाग उठी है। प्रकृति के कण-कण में नई उमंग और प्रसन्नता दिखाई देने लगी है। सभी को विश्वास है कि वर्षा होने से गर्मी और थकान दूर हो जाएगी।
प्रश्न 4. गीत से उन पंक्तियों का चयन करें जिनमें जहाँ-तहाँ मेघ की ओर टकटकी लगाए लोगों का वर्णन किया गया है।
उत्तर—
“खेतों-खलिहानों, मुँडेरों पर, छत पर, घर-घर,
हेर रहे अनगिनत हम तुमको जल वाले जलधर।”
प्रश्न 5. इस गीत में बादल को अनेक संबोधनों से पुकारा गया है। उन्हें चुनें और बताओ कि आपको कौन- सा संबोधन सर्वाधिक सुंदर लगा और क्यों?
उत्तर— कविता में बादल के लिए निम्न संबोधन आए हैं—
ओ नभ में मँडराते बादल
ओ मादक उन्मादक बादल
उमड़-बरसने वाले बादल
इनमें ‘ओ मादक उन्मादक बादल’ संबोधन सबसे सुंदर लगता है, क्योंकि बादलों के आने से प्रकृति में उमंग और मस्ती छा जाती है तथा सभी के मन में वर्षा की खुशी जाग उठती है।
प्रश्न 6. इस कविता में ‘मन के होंठ’, ‘मन की बूँद’, ‘मन की थकान’, जैसे कुछ शब्द प्रयोग किए गए हैं। ‘कल्पना’ शब्द को लेकर इसी प्रकार के तीन प्रयोग करें।
उत्तर—
कल्पना की उड़ान
कल्पना के पंख
कल्पना की तूलिका
प्रश्न 7. भाव स्पष्ट करें-
(क) थकी अनमनी धूप माँगती है जलमय बाँहें।
उत्तर— भीषण गर्मी में लगातार तपते-तपते धूप भी थक गई है। इसलिए वह वर्षा से भरे बादलों की शीतलता चाहती है।
(ख) मन की बूँदों से कब तक जीवन को तृप्ति मिले।
उत्तर— केवल कल्पनाओं से जीवन की वास्तविक प्यास नहीं बुझ सकती। मनुष्य को सच्ची तृप्ति वास्तविक वर्षा और जल से ही मिल सकती है।
प्रश्न 8. इस गीत में कई जगह प्रकृति और निर्जीव वस्तुओं में मनुष्य की-सी चेष्टाएँ और क्रियाकलाप दिखाए इस गीत से गए हैं। जैसे- ‘कब से जल–बूँदों को विह्वल शैल निहार रहें।’ इसी प्रकार के तीन अन्य उदाहरण छाँटें।
उत्तर—
“कब से आतप दग्ध वनों के प्राण पुकार रहे।”
“सूखे मूल कगारों का वीरान मचलता है।”
“जाग उठी मरु-मरु में सुख की वाष्पाकुल आशा।”
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें
- ‘ ओ नभ में मँडराते बादल‘ कविता के कवि ………….. हैं।
- सूखे ………….. को ………….. का आभास दिखा।
- थकी अनमनी ………….. माँगती है ………….. बाँहें।
- कब तक ………….. बालू पर ………… का फूल खिले।
- तुम बरसो ………….. की थकान का मन ………….. घोले।
उत्तर –
- ‘ ओ नभ में मँडराते बादल’ कविता के कवि रामेश्वर शुक्ल अंचल हैं।
- सूखे सुमनों को हरियाली का आभास दिखा।
- थकी अनमनी धूप माँगती है जलमय बाँहें।
- कब तक जलती बालू पर यौवन का फूल खिले।
- तुम बरसो मन की थकान का मन मिश्री घोले।
O Nabh Mein Mandratey Badal Class 8 Question Answers के बारे में बस इतना ही। आशा है कि आपको यह उपयोगी लगा होगा। आप इस पोस्ट के बारे में अपने विचार नीचे टिप्पणी अनुभाग (comment section) में साझा करें।
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