“सुदामा चरित” JKBOSE की कक्षा 8 (Class 8 of JKBOSE) के छात्रों की पाठ्यपुस्तक पुष्प भाग 2 हिंदी का बीसवां अध्याय है। यह कविता नरोत्तमदास द्वारा लिखित है। यह पोस्ट Sudama Charit Class 8 Chapter 18 Question Answers के बारे में है। इस पोस्ट में कविता “सुदामा चरित” ” के शब्दार्थ, सरलार्थ और उससे जुड़े कुछ प्रश्न उत्तर पढ़ेंगे। पढ़ेंगे। पिछली पोस्ट में, आपने पोस्ट Jammu Kashmir Mein Hindi Class 8 Chapter 19 Question Answers के बारे में पढ़ा। आइए शुरू करें:

Sudama Charit Class 8 Chapter 20 Question Answers
Sudama Charit Class 8 Chapter 20 Summary
कविता का सार/प्रतिपाद्य
प्रस्तुत कविता ‘सुदामा चरित’ के रचयिता श्री नरोत्तमदास हैं। इस कविता में कवि ने श्री कृष्ण और सुदामा की सच्ची, आदर्श और निःस्वार्थ मित्रता का सुंदर चित्रण किया है।
कवि बताता है कि सुदामा और श्री कृष्ण की मित्रता आज भी संसार के लिए आदर्श है। सुदामा अत्यंत गरीब और दीन अवस्था में श्री कृष्ण से मिलने द्वारिका पहुँचते हैं। उनके शरीर पर न ठीक कपड़े हैं और न पैरों में जूते। उनके पैरों में गहरी बिवाइयाँ पड़ी हुई हैं। उनकी ऐसी दशा देखकर श्री कृष्ण बहुत दुखी होते हैं और प्रेम व करुणा से उनके आँसुओं से सुदामा के पैर धोते हैं।
श्री कृष्ण सुदामा से भाभी द्वारा भेजी गई पोटली के बारे में पूछते हैं। वे बचपन की मित्रता को याद करते हुए चने खाने की घटना का मज़ाकिया ढंग से उल्लेख करते हैं। कृष्ण का व्यवहार देखकर उनकी सच्ची मित्रता, प्रेम और अपनापन स्पष्ट होता है। सुदामा कृष्ण के प्रेम और सम्मान से इतने भावुक हो जाते हैं कि उस आनंद को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते।
सुदामा जब अपने गाँव वापस लौटते हैं तो वहाँ का रूप पूरी तरह बदला हुआ पाते हैं। उनकी टूटी-फूटी झोंपड़ी की जगह सुंदर महल बन चुका होता है। जहाँ उन्हें कभी दो समय का भोजन भी कठिनाई से मिलता था, वहाँ अब हाथी-घोड़े और अनेक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हैं। यह सब देखकर सुदामा आश्चर्यचकित हो जाते हैं।
इस प्रकार कविता में सच्ची मित्रता, प्रेम, करुणा और भगवान श्री कृष्ण की कृपा का सुंदर चित्रण किया गया है। कविता यह संदेश देती है कि सच्चा मित्र वही है जो कठिन समय में अपने मित्र का साथ दे और उसकी सहायता करे।
काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या
- सीस पगा न झगा तन में, प्रभु ! जाने को आहि बसे केहि ग्रामा।
धोती फटी-सी लटी दुपटी, अरु पाँय उपानह को नहिं सामा ॥
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकिसों वसुधा अभिरामा ।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा ॥
शब्दार्थ- सीस = सिर। पगा = पगड़ी। झगा = कुरता (कपड़ा)। तन = शरीर। आहि = आकर। बसे = रहना। दुपटी = चादर, दुपट्टा। उपानह = जूता। दुर्बल = कमज़ोर लाचार। चकिसो= देखना। बसुधा = धरती। अभिरामा = मनोहर, सुंदर, प्रिय । अरु = और। दीनदयाल = श्री कृष्ण। धाम = महल। बतावत = बताना।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य-पुस्तक ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘सुदामा चरित’ कविता से लिया गया है। इसके कवि नरोत्तमदास हैं। इस पद में कवि ने सुदामा की दीन और निर्धन अवस्था का मार्मिक वर्णन किया है।
व्याख्या— इन पंक्तियों में कवि बताते हैं कि सुदामा बहुत ही गरीब और दयनीय अवस्था में श्री कृष्ण के महल के द्वार पर पहुँचे। उनके सिर पर पगड़ी और शरीर पर उचित वस्त्र नहीं थे। उनकी धोती फटी हुई थी और पैरों में जूते भी नहीं थे। वे कमजोर और लाचार दिखाई दे रहे थे। वे श्री कृष्ण के महल को देखकर उसे पाने का रास्ता पूछ रहे थे। जब उनसे उनका नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम सुदामा बताया। इस प्रकार कवि ने सुदामा की गरीबी और कठिन जीवन का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है।
- ऐसे बेहाल बिवाइन सों, पग कंटक जाल लगे पुनि जोए ।
हाय ! महादुख पायो सखा, तुम आए इतै न कितै दिन खोए ॥
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिकै करुनानिधि रोए ।
पानी परात को हाथ छुयो नहिँ, नैनन के जल सों पग धोए ॥
शब्दार्थ- बेहाल = बुरी हालत। बिवाइन = बिवाइयाँ, पैरों के तलवे की चमड़ी फटने का रोग। पग = पैर। कंटक = काँटें। जोए = उगना। महादुख = अत्यधिक पीड़ा। इतै = यहाँ। कितै = कितने। दीन दसा = गरीबी की दशा। करुना = दया। करुनानिधि = दया के सागर। परात = पानी रखने की बहुत बड़ी थाली या थाल। नैनन = आँख।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘सुदामा चरित’ कविता से लिया गया है। इसके कवि नरोत्तमदास हैं। इन पंक्तियों में सुदामा की दीन दशा देखकर श्री कृष्ण के मन में उत्पन्न प्रेम और करुणा का चित्रण किया गया है।
व्याख्या— कवि कहते हैं कि सुदामा के पैरों में गहरी बिवाइयाँ पड़ी हुई थीं और वे बहुत कष्ट में थे। उनके पैरों की दशा ऐसी लग रही थी जैसे उनमें काँटों का जाल उग आया हो। सुदामा को इस हालत में देखकर श्री कृष्ण बहुत दुखी हुए और बोले कि हे मित्र! तुमने बहुत दुःख सहा है। अपने मित्र की दयनीय स्थिति देखकर श्री कृष्ण की आँखों से आँसू निकल पड़े। उन्होंने पानी से उनके पैर धोने के बजाय अपने आँसुओं से ही सुदामा के पैर धो दिए। इससे उनकी सच्ची मित्रता और प्रेम प्रकट होता है।
- कछु भाभी हमके दियो, सो तुम काहे न देत ।
चापि पोटरी काँख में, रहे कहो केहि हेतु ॥
शब्दार्थ – कछु = कुछ। हमाके = श्री कृष्ण के लिए। काहे = क्यों नहीं। चॉंपि = दबाकर। पोटरी = पोटली। काँख = बगल। केहि = किस कारण।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘सुदामा चरित’ कविता से लिया गया है। इसके कवि नरोत्तमदास हैं। यहाँ कवि ने श्री कृष्ण द्वारा अपने मित्र सुदामा से भाभी द्वारा भेजी गई भेंट के बारे में पूछने का प्रसंग प्रस्तुत किया है।
व्याख्या— इन पंक्तियों में श्री कृष्ण सुदामा से प्रेमपूर्वक कहते हैं कि मेरी भाभी ने मेरे लिए अवश्य कुछ भेजा होगा। तुम उसे मुझे क्यों नहीं दे रहे हो? तुम उस पोटली को अपनी बगल में दबाकर क्यों बैठे हो? श्री कृष्ण जानते थे कि सुदामा संकोच के कारण भेंट देने में झिझक रहे हैं। इसलिए वे मित्रता के अधिकार से उनसे पोटली देने के लिए कहते हैं। इस प्रसंग से दोनों मित्रों के बीच का अपनापन और स्नेह दिखाई देता है।
- आगे चना गुरुमातु दए ते, लए तुम चाबि हमें नहिं दीने ।
स्याम कह्यो मुसकाय सुदामा सों, “चोरी की बान में हौ जू प्रवीने ॥
पोटरी काँख में चापि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा रस भीने ।
पाछिली बानि अजौ न तजो तुम, तैसई भाभी के तंदुल कीन्हे ॥”
शब्दार्थ – दए = देना। चाबि = चवाना। दीने = देना। स्याम = कृष्ण। बान = कला। प्रवीने = कुशल पाटरा पोटली। काँख = बगल। चाँपि = दबाए हुए। सुधा = अमृत। पाछिली बानि = पिछली बार। अजौ = आज भी। तैसई = उसी प्रकार। तंदुल = चावल के दाने। कीन्हे = किया।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘सुदामा चरित’ कविता से लिया गया है। इसके कवि नरोत्तमदास हैं। इन पंक्तियों में श्री कृष्ण और सुदामा के बचपन की मित्रता तथा गुरुकुल के दिनों की एक घटना का स्मरण किया गया है।
व्याख्या— श्री कृष्ण मुस्कराते हुए सुदामा को उनके बचपन की बात याद दिलाते हैं। वे कहते हैं कि जब हम गुरु के आश्रम में रहते थे, तब गुरुमाता ने हम दोनों को चने दिए थे, लेकिन तुमने वे चने अकेले ही खा लिए और मुझे नहीं दिए। कृष्ण मज़ाक में कहते हैं कि तुम आज भी चोरी करने की कला में बहुत कुशल हो। तुम भाभी द्वारा भेजी गई चावल की पोटली को बगल में दबाए बैठे हो और उसे खोल नहीं रहे हो। इस प्रकार कृष्ण अपने मित्र से हँसी-मज़ाक करते हुए उनके संकोच को दूर करते हैं।
- वह पुलकनि, वह उठि मिलनि, वह आदर की बात ।
वह पठवनि गोपाल की, कछू न जानी जात ॥
कहा भयो जो अब भयो, हरि को राज-समाज ।
हाँ आवत नाहीं हुतो, वाही पठयो ठेलि ॥
शब्दार्थ – पुलकनि = आनंद एवं हर्ष से युक्त । मिलनि = मिलना। गोपाल = श्री कृष्ण । कछू = कुछ। जात = व्यक्त करना। आदर = सम्मान। पठवनि = विदाई।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘सुदामा चरित’ कविता से लिया गया है। इसके कवि नरोत्तमदास हैं। यहाँ कवि ने सुदामा के मन में श्री कृष्ण से मिलने के बाद उठने वाले भावों का सुंदर वर्णन किया है।
व्याख्या— सुदामा अपने घर लौटते समय श्री कृष्ण के साथ बिताए पलों को याद करते हैं। वे सोचते हैं कि कृष्ण का प्रसन्न होकर उनसे मिलना, प्रेम और सम्मान से बातें करना तथा स्नेहपूर्वक विदा करना बहुत आनंददायक था। सुदामा के लिए इन भावपूर्ण क्षणों को शब्दों में व्यक्त करना कठिन था। वे यह भी सोचते हैं कि अब श्री कृष्ण बड़े राजा हो गए हैं, फिर भी उन्होंने अपने गरीब मित्र के साथ पहले जैसा ही प्रेम और अपनापन दिखाया।
- घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज ।
अब कहिौं समुझाय कै, बहु धन धरौ सकेलि ॥
शब्दार्थ- काज = किसी वस्तु का मोल लगाने के लिए कहना । तनक = थोड़ा। कर ओड़त फिरे = हाथ फैलाता फिरता था। धरौ सकेलि = इकट्ठा करो, संभाल कर रखो ।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘सुदामा चरित’ कविता से लिया गया है। इसके कवि नरोत्तमदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने सुदामा की पुरानी गरीबी और दयनीय जीवन का वर्णन किया है।
व्याख्या— कवि कहते हैं कि सुदामा पहले बहुत गरीब थे। उन्हें थोड़े-से भोजन या अनाज के लिए घर-घर जाकर हाथ फैलाकर भिक्षा माँगनी पड़ती थी। उनका जीवन बहुत कठिन था और उनके पास आवश्यक वस्तुएँ भी पर्याप्त नहीं थीं। श्री कृष्ण से मिलने के बाद उनकी गरीबी दूर हो गई और उनके घर में धन-संपत्ति तथा सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं रही।
- वैसोई राज-समाज बने, गज-बाजि घने मन संभ्रम छायो ।
कैधों पर्यो कहुँ मारग भूलि, कि फेरि कै मैं अब द्वारका आयो ।।
भौन बिलोकिबे को मन लोचत, अब सोचत ही सब गाँव मझायो ।
पूँछत पांड़े फिरे सब सों पर, झोंपरी को कहुँ खोज न पायो ।।
शब्दार्थ- गज = हाथी, आठ की संख्या। संभ्रम = घूमना, चक्कर, फेरा। कैधों= या, अथवा मारग = रास्ता, पथ। भौन = भवन। बिलोकिबे = देखना। लोचत = लालायित। गाँव मझायो = गाँव भर छान मारा। वाजि = घोड़े।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘सुदामा चरित’ कविता से लिया गया है। इसके कवि नरोत्तमदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने सुदामा के गाँव लौटने पर वहाँ आए अद्भुत परिवर्तन का वर्णन किया है।
व्याख्या— सुदामा जब अपने गाँव लौटते हैं तो वहाँ का दृश्य देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं। उन्हें अपना गाँव द्वारिका जैसा दिखाई देता है। चारों ओर हाथी-घोड़े और सुंदर भवन दिखाई देते हैं। सुदामा सोचते हैं कि कहीं वे रास्ता भूलकर फिर से द्वारिका तो नहीं आ गए। वे अपनी पुरानी झोंपड़ी को खोजने के लिए पूरे गाँव में घूमते हैं और लोगों से उसके बारे में पूछते हैं, लेकिन उन्हें अपनी झोंपड़ी कहीं नहीं मिलती। वास्तव में उनकी झोंपड़ी अब एक सुंदर महल में बदल चुकी थी।
- कै वह टूटी-सी छानी हुती, कहँ कंचन के अब धाम सुहावत ।
कै पग में पनही न हती, कहँ लै गजराजहु ठाढ़े महावत ॥
भूमि कठोर पै रात कटै, कहँ कोमल सेज पर नींद न आवत ।।
कै जुरतो नहिं कोदो सवाँ, कहँ प्रभु के परताप ते दाख न भावत ॥
शब्दार्थ – कै= किस कदर । छानी = घास पत्तों की झोंपड़ी। हती = होती थी। कहँ = कहाँ। कंचन = सोना स्वर्ण। धाम = महल। सुहावत = सुंदर लगना। पग = पैर। पनहीं = जूता । न हती = न होना। कहँ लै = कहाँ अब। गजराजहु = हाथी। ठोढ़े = खड़े होते हैं। महावत = हाथी चलाने वाला। जुरतों = पूरा पड़ना। दाख= अगूर, मुनक्का = किशमिश।
प्रसंग— प्रस्तुत पद्यांश ‘पुष्प भाग-3’ में संकलित ‘सुदामा चरित’ कविता से लिया गया है। इसके कवि नरोत्तमदास हैं। इन पंक्तियों में कवि ने सुदामा के जीवन में आए सुखद परिवर्तन और श्री कृष्ण की कृपा का वर्णन किया है।
व्याख्या— कवि कहते हैं कि जिस स्थान पर पहले सुदामा की टूटी-फूटी झोंपड़ी थी, वहाँ अब सुंदर और भव्य महल बना हुआ था। जिन सुदामा के पैरों में कभी जूते तक नहीं होते थे, उनके लिए अब हाथी और महावत तैयार खड़े रहते थे। जो व्यक्ति कठोर जमीन पर रात बिताता था, उसे अब आरामदायक बिस्तर प्राप्त था। जिसे कभी भरपेट भोजन भी नहीं मिलता था, उसे अब अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन और सुख-सुविधाएँ प्राप्त थीं। इस प्रकार श्री कृष्ण की कृपा से सुदामा का निर्धन जीवन सुख और समृद्धि से भर गया।
Sudama Charit Class 8 Chapter Question Answers
अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
कविता से
प्रश्न 1. सुदामा की दीनदशा देखकर श्रीकृष्ण की क्या मनोदशा हुई ? अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर— सुदामा की दीन-दशा देखकर श्री कृष्ण बहुत दुखी और व्याकुल हो गए। अपने प्रिय मित्र की ऐसी हालत देखकर उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े। उन्होंने पानी से सुदामा के पैर धोने के बजाय अपने आँसुओं से उनके पैर धोए। इससे श्री कृष्ण के हृदय में सुदामा के प्रति गहरा प्रेम, करुणा और सच्ची मित्रता प्रकट होती है।
प्रश्न 2. “पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सों पग धोए।” पंक्ति में वर्णित भाव का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर— इस पंक्ति में श्री कृष्ण का सुदामा के प्रति गहरा प्रेम और अपनापन प्रकट हुआ है। सुदामा की दयनीय दशा देखकर कृष्ण इतने दुखी हुए कि वे पानी से उनके पैर नहीं धो सके। उन्होंने अपने आँसुओं से ही सुदामा के पैर धोए। यह दृश्य उनकी सच्ची मित्रता, करुणा और संवेदनशीलता को दर्शाता है।
प्रश्न 3. “ चोरी की बान में हौ जू प्रवीने।”
(क) उपर्युक्त पंक्ति कौन, किससे कह रहा है?
उत्तर— यह पंक्ति श्री कृष्ण अपने बाल सखा सुदामा से कह रहे हैं।
(ख) इस कथन की पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिए।
उत्तर— सुदामा जब श्री कृष्ण से मिलने द्वारिका पहुँचे तो वे अपनी पत्नी द्वारा भेजे गए चावलों की पोटली बगल में छिपाए हुए थे। कृष्ण ने जब उनसे पोटली के बारे में पूछा, तो सुदामा संकोच करने लगे। यह देखकर कृष्ण ने हँसी-मज़ाक में कहा कि तुम चोरी की कला में आज भी निपुण हो। इस प्रकार उन्होंने मित्रता के अधिकार से सुदामा की झिझक दूर की।
(ग) इस उपालंभ (शिकायत) के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा है?
उत्तर— इसके पीछे कृष्ण और सुदामा के गुरुकुल के समय की घटना है। एक बार गुरुमाता ने दोनों मित्रों को चने दिए और उन्हें बाँटकर खाने के लिए कहा। जंगल में सुदामा ने वे चने अकेले ही खा लिए और कृष्ण को नहीं दिए। जब कृष्ण ने चबाने की आवाज के बारे में पूछा, तो सुदामा ने बहाना बनाकर कहा कि ठंड के कारण उनके दाँत कटकटा रहे हैं। इसी घटना को याद करके कृष्ण ने सुदामा से मज़ाक में कहा कि वे चोरी करने में आज भी कुशल हैं।
प्रश्न 4. द्वारिका से खाली हाथ लौटते समय सुदामा मार्ग में क्या-क्या सोचते जा रहे थे? वह श्री कृष्ण के व्यवहार से क्यों खीझ रहे थे ? सुदामा के मन की दुविधा को अपने शब्दों में प्रकट कीजिए।
उत्तर— द्वारिका से लौटते समय सुदामा सोच रहे थे कि वे अपनी गरीबी और दुःख दूर करने के लिए कृष्ण के पास गए थे, लेकिन अपनी समस्या उनसे कह ही नहीं पाए। कृष्ण ने उनका बहुत आदर-सत्कार किया और प्रेम से विदा किया, परंतु उन्हें धन या कोई वस्तु नहीं दी। इसलिए सुदामा के मन में यह दुविधा थी कि कृष्ण ने उनकी सेवा तो की, लेकिन उनकी गरीबी दूर करने के लिए कुछ नहीं किया।
प्रश्न 5. अपने गाँव लौटकर जब सुदामा अपनी झोंपड़ी नहीं खोज पाए, तब उनके मन में क्या-क्या विचार आए ? कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर— गाँव लौटकर सुदामा अपनी झोंपड़ी की जगह बड़े-बड़े भवन और महल देखकर हैरान हो गए। उन्हें लगा कि शायद वे रास्ता भूलकर फिर से द्वारिका आ गए हैं। वे अपनी पुरानी झोंपड़ी को पूरे गाँव में खोजते रहे, लेकिन उसे कहीं नहीं पा सके। इस कारण उनके मन में आश्चर्य और भ्रम उत्पन्न हो गया।
प्रश्न 6. निर्धनता के बाद मिलनेवाली संपन्नता का चित्रण कविता की अंतिम पंक्तियों में वर्णित है। उसे अपने शब्द में लिखिए।
उत्तर— कविता में सुदामा की गरीबी और उसके बाद मिली संपन्नता का सुंदर चित्रण किया गया है। पहले सुदामा के पास रहने के लिए टूटी-फूटी झोंपड़ी थी, पैरों में जूते नहीं थे और भोजन भी पर्याप्त नहीं मिलता था। वे कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताते थे। श्री कृष्ण की कृपा से उनकी झोंपड़ी सुंदर महल में बदल गई, उनके लिए हाथी और महावत तैयार रहने लगे और उन्हें अनेक प्रकार के सुख-सुविधाएँ प्राप्त हुईं। इस प्रकार उनका निर्धन जीवन सुख और समृद्धि से भर गया।
कविता से आगे
प्रश्न 1. द्रुपद और द्रोणाचार्य भी सहपाठी थे, इनकी मित्रता और शत्रुता की कथा महाभारत से खोजकर सुदामा के कथानक से तुलना कीजिए।
उत्तर— द्रुपद और द्रोणाचार्य गुरुकुल में सहपाठी और मित्र थे। द्रुपद ने उस समय द्रोणाचार्य से मित्रता का वचन दिया था। बाद में द्रुपद राजा बन गए और द्रोणाचार्य निर्धन हो गए। जब द्रोणाचार्य द्रुपद के पास सहायता माँगने गए, तो द्रुपद ने पुरानी मित्रता स्वीकार नहीं की और उनका अपमान किया। इससे दोनों के बीच शत्रुता हो गई।
इसके विपरीत, श्री कृष्ण राजा बनने के बाद भी अपने निर्धन मित्र सुदामा को नहीं भूले। उन्होंने सुदामा का प्रेमपूर्वक स्वागत किया और उनकी गरीबी दूर कर दी। इस प्रकार द्रुपद-द्रोण की मित्रता स्वार्थ और अहंकार के कारण टूट गई, जबकि कृष्ण-सुदामा की मित्रता सच्चे प्रेम और अपनापन पर आधारित थी।
प्रश्न 2. उच्च पद पर पहुँचकर या अधिक समृद्ध होकर व्यक्ति अपने निर्धन माता-पिता, भाई-बंधुओं नज़र फेरने लग जाता है, ऐसे लोगों के लिए सुदामा चरित कैसी चुनौती खड़ी करता है? लिखिए।
उत्तर— ‘सुदामा चरित’ ऐसे लोगों को यह संदेश देता है कि धन और ऊँचा पद प्राप्त करने के बाद भी व्यक्ति को अपने पुराने संबंधों और निर्धन मित्रों को नहीं भूलना चाहिए। श्री कृष्ण स्वयं महान और समृद्ध होते हुए भी सुदामा को देखकर उनसे उसी प्रेम और अपनत्व से मिले। उन्होंने अपने मित्र की गरीबी को समझा और उसकी सहायता की। कविता सिखाती है कि सच्ची महानता धन में नहीं, बल्कि प्रेम, विनम्रता और दूसरों की सहायता करने में है।
अनुमान और कल्पना
प्रश्न 1. अनुमान कीजिए यदि आपका कोई अभिन्न मित्र आपसे बहुत वर्षों बाद मिलने आए तो आपको कैसा अनुभव होगा?
उत्तर— यदि मेरा कोई प्रिय मित्र कई वर्षों बाद मुझसे मिलने आएगा तो मुझे बहुत खुशी और उत्साह होगा। पुरानी यादें ताजा हो जाएँगी और उससे मिलकर मन प्रसन्न हो उठेगा। हम अपने बचपन और साथ बिताए हुए समय को याद करेंगे। लंबे समय बाद मित्र से मिलना मेरे लिए भावुक और आनंददायक अनुभव होगा।
प्रश्न 2. कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीति।
विपति कसौटी जे कसे तेई साँचे मीत ॥
इस दोहे में रहीम ने सच्चे मित्र की पहचान बताई है। इस दोहे से सुदामा चरित की समानता किस प्रकार दिखती है ? लिखिए।
उत्तर— रहीम के दोहे का भाव है कि सुख और संपत्ति के समय बहुत-से लोग अपने बन जाते हैं, लेकिन संकट के समय जो साथ देता है वही सच्चा मित्र होता है। यही भाव ‘सुदामा चरित’ में दिखाई देता है। सुदामा निर्धन और दुखी थे, फिर भी श्री कृष्ण ने उन्हें अपना सच्चा मित्र माना और प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया। उन्होंने सुदामा की सहायता भी की। इसलिए रहीम के दोहे और ‘सुदामा चरित’ दोनों में सच्ची मित्रता की पहचान एक समान दिखाई देती है।
भाषा की बात
प्रश्न 1. “पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सो पग धोए“
ऊपर लिखी गई पंक्ति को ध्यान से पढ़िए। इसमें बात को बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर चित्रित किया गया है। जब किसी बात को इतना बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है तो वहाँ पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। आप भी कविता में से एक अतिशयोक्ति अलंकार का उदाहरण छाँटिए।
उत्तर- (i) ऐसे बेहाल बिवाइन सों,
पग कंटक जाल लगे पुनि जोए ।
(ii) कै वह टूटी-सी छानी हुती,
कहँ कंचन के अब धाम सुहावत ।
रिक्त स्थानों की पूर्ति करें
- सुदामा चरित के कवि ………….. हैं।
- सीस ………….. न ………….. तन में।
- करुणा करिकै कै ………….. रोए।
- वह ………….. वह ………….. मिलनि।
- कै ………….. नहिं ………….. सवाँ।
उत्तर-
- सुदामा चरित के कवि नरोत्तमदास हैं।
- सीस पगा न झगा तन में।
- करुणा करिकै कै करुनानिधि रोए।
- वह पुलकनि वह उठि मिलनि।
- कै जुरतो नहिं कोदो सवाँ।
Sudama Charit Class 8 Chapter 20 Question Answers के बारे में बस इतना ही। आशा है कि आपको यह उपयोगी लगा होगा। आप इस पोस्ट के बारे में अपने विचार नीचे टिप्पणी अनुभाग (comment section) में साझा करें।
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